नई दिल्ली। बिहार से राज्यसभा की पांच सीटों के लिए चुनाव की घोषणा ने दावेदारों की धड़कन बढ़ा दी है, किंतु असली चर्चा अंकगणित से ज्यादा जदयू की आंतरिक राजनीति को लेकर है। विशेष रूप से मौजूदा उपसभापति हरिवंश नारायण की संभावना को चुनाव की औपचारिक प्रक्रिया दलगत हैसियत से आगे बढ़ाकर सियासी संकेतों की परीक्षा बना दिया है।
जदयू के टिकट पर दो कार्यकाल पूरे कर चुके हरिवंश के सामने तीसरी बार उच्च सदन में पहुंचने की चुनौती पार्टी की परंपरा, सामाजिक समीकरण और दलगत संतुलन से जुड़ी है। संख्या बल के लिहाज से स्थिति स्पष्ट दिखाई देती है।
बिहार विधानसभा में प्रत्येक राज्यसभा सीट के लिए 41 विधायकों का समर्थन आवश्यक है। भाजपा और जदयू, दोनों के पास इतनी संख्या है कि वे दो-दो उम्मीदवार आराम से जिता सकते हैं। इस दृष्टि से पांचों सीटों पर परिणाम लगभग तय माने जा रहे हैं। विपक्षी खेमे की सीमित संख्या और उसके भीतर संभावित असहमति को देखते हुए किसी बड़े उलटफेर की संभावना कम है।
तीसरी बार राज्यसभा भेजना जेडीयू के लिए अपवाद
किंतु राजनीतिक प्रक्रिया केवल गणित से संचालित नहीं होती है। संदेश-संकेत भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। जदयू की दुविधा यहीं से शुरू होती है। पार्टी की परंपरा है कि किसी नेता को लगातार तीसरी बार राज्यसभा या विधान परिषद भेजना अपवाद की तरह कभी-कभी ही हो पाया है। ऐसे में हरिवंश की दावेदारी स्वत: ही विचार का विषय है। वे अप्रैल 2014 से राज्यसभा सदस्य हैं और अगस्त 2018 से उपसभापति पद संभाल रहे हैं।
संसदीय कार्यवाही के संचालन में उनकी संयमित शैली और विभिन्न दलों के बीच उनकी स्वीकार्यता निर्विवाद मानी जाती है। परंतु किसी भी दल की राजनीति सिर्फ संसदीय दक्षता पर आधारित नहीं होती है।
रामनाथ की दावेदारी पर कोई संशय नहीं
सामाजिक प्रतिनिधित्व और संतुलन भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसी संदर्भ में केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री रामनाथ ठाकुर का नाम प्रासंगिक हो जाता है। अति पिछड़ा वर्ग से आने और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का पुत्र होना ही जदयू के सामाजिक आधार के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए रामनाथ की दावेदारी पर संशय नहीं दिख रही है।
किंतु हरिवंश का मामला केवल संगठनात्मक नहीं, प्रतीकात्मक भी है। वर्ष 2022 में जब बिहार में जदयू ने भाजपा से अलग होकर महागठबंधन के साथ सरकार बनाई थी, तब उनसे उपसभापति पद छोड़ने की अपेक्षा की गई थी। उन्होंने इसे संवैधानिक मर्यादा और संसदीय परंपरा से जोड़ते हुए पद पर बने रहना उचित समझा। उस निर्णय ने उन्हें एक निष्पक्ष संसदीय व्यक्तित्व की छवि तो दी, लेकिन पार्टी के भीतर असहजता भी उत्पन्न हुई।
बाद में राजनीतिक समीकरण बदले और भाजपा के साथ जदयू का फिर गठबंधन हुआ, मगर उस दौर की स्मृति पूरी तरह धुंधली नहीं हुई। जाहिर है, जदयू के सामने प्रश्न है कि वह अनुभव और संसदीय गरिमा को प्राथमिकता देती है या सामाजिक प्रतिनिधित्व के व्यापक संदेश को।
हरिवंश का व्यक्तित्व और राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता से दावेदारी मजबूत
हरिवंश का व्यक्तित्व और राष्ट्रीय स्तर पर उनकी स्वीकार्यता उन्हें मजबूत दावेदार बनाते हैं। किंतु पार्टी की परंपरा और सामाजिक संतुलन की अनिवार्यता उनके मार्ग में संशय के द्वार खोलती है।
भाजपा कोटे से उपेंद्र कुशवाहा की दावेदारी भी समीकरणों का हिस्सा है। लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद उन्हें राज्यसभा भेजा गया था। अब विधानसभा चुनाव के पश्चात उनके पुत्र को मंत्रिमंडल में स्थान मिला है, जिन्हें नियत अवधि में विधानमंडल का सदस्य बनना आवश्यक है। भाजपा के सामने संतुलन साधने की चुनौती है। अनुभव और सामाजिक प्रभाव को महत्व दे या परिवारवाद के आरोपों से दूरी बनाए रखे।












