नई दिल्ली। तमिलनाडु में आगामी चुनावों से पहले राजनीतिक माहौल तेज हो गया है और इस बार परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा चुनावी बहस के केंद्र में आ गया है। इसने पहले से ही हाई-स्टेक माने जा रहे चुनावी मुकाबले को और अधिक जटिल और दिलचस्प बना दिया है।
दरअसल, परिसीमन की प्रक्रिया के तहत लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं और संख्या का पुनर्निर्धारण किया जाता है। यह प्रक्रिया जनसंख्या के आधार पर होती है, जिससे विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव संभव होता है। दक्षिण भारत के कई राज्यों, खासकर तमिलनाडु में, इसको लेकर चिंता जताई जा रही है।
परिसीमन बना चुनावी मुद्दा
राज्य के राजनीतिक दलों का कहना है कि अगर भविष्य में परिसीमन, जनसंख्या के वर्तमान आंकड़ों के आधार पर किया गया तो दक्षिणी राज्यों को नुकसान हो सकता है।
तमिलनाडु जैसे राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण के मामले में बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि कुछ अन्य राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है। ऐसे में सीटों का संतुलन बदल सकता है।
डीएमके (DMK) और उसके सहयोगी दल इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि परिसीमन के जरिए दक्षिण भारत की राजनीतिक ताकत को कमजोर किया जा सकता है।
केंद्र सरकार और बीजेपी का कहना है कि अभी इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है और सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखा जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि परिसीमन का मुद्दा सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है, बल्कि यह अब क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीतिक अधिकारों से जुड़ गया है। यही कारण है कि यह मुद्दा मतदाताओं के बीच भी तेजी से चर्चा में आ रहा है।
इसके अलावा, तमिलनाडु में पारंपरिक तौर पर डीएमके और एआईएडीएमके (AIADMK) के बीच सीधी टक्कर होती रही है, लेकिन इस बार बीजेपी भी अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में परिसीमन का मुद्दा चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और जोर पकड़ सकता है और चुनावी रैलियों, भाषणों और प्रचार में प्रमुख स्थान बनाए रखेगा। कुल मिलाकर, परिसीमन ने तमिलनाडु की राजनीति में एक नया आयाम जोड़ दिया है, जिससे चुनावी मुकाबला और भी रोचक हो गया है।













