
नई दिल्ली। देशभर में परीक्षा प्रणाली और शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठे सवालों के बीच जंतर-मंतर से शुरू हुआ आंदोलन लाखों छात्रों और अभिभावकों की चिंता की आवाज बनकर सामने आया।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या शिक्षा व्यवस्था में सुधार की यह मांग अपने असली मकसद तक पहुंच पाएगी, या फिर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और अराजकता के शोर में इसका मूल मुद्दा पीछे छूट जाएगा।
यही सवाल अब इस पूरे आंदोलन के केंद्र में है। यहां लोगों ने भड़ास निकालने का अड्डा ज्यादा बना लिया है, इसीलिए असल मुद्दों से, बदलाव की बात से भटक गए हैं।
आपके मन में भी उठी होगी ये आवाज
बतौर माता-पिता जब आप अपने दिल पर हाथ रखकर पूछेंगे तो, इस बात से जरूर सहमत होंगे कि हां, जंतर-मंतर से उठी आवाज यानी मुद्दा तो सही उठा, बहुत बड़े वर्ग के ‘मन की बात उठी’।
लेकिन, ये शिकन भी तुरंत आपको घेर लेगी क्या राजनीतिक साजिशों और अराजकता के बीच “चरमराई शिक्षा व्यवस्था में सुधार’ की वाजिब आवाज अपने मूल सुधार के उद्देश्य तक पहुंच पाएगी?
यदि आप इस सुधार की हुंकार और उत्साह के साथ जंतर-मंतर की उस भीड़ के बीच पहुंच रहे हैं तो आपका ये लक्ष्य एक अधूरे सपने की तरह अंधकार में विलीन हो जाएगा।

सोशल मीडिया का स्टेटस अपडेट स्थल बना
आप पाएंगे कि वहां भीड़ है, राजनीति है, अराजकता है, साजिश है और जेनजी की वो हुंकार है, अरे, तुम हो आए, हम रह गए, वहां जाने का स्टेटस, सेल्फी भी तो इंस्टा पर अपडेट करना है, तेजी से भीड़ का आना-जाना यहां लगा हुआ है।
20 जुलाई के बाद से दिख रही इस भीड़ का यही तंत्र है कि वहां कोई तंत्र नहीं है। और इसमें वाजिब सा शिक्षा सुधार का मुद्दा लेकर पहुंचे दूर दराज के राज्यों के छात्र जो अपने अभिभावकों तक को नहीं बताकर आए कुछ घंटे या एक दिन रुककर ठगा सा ही महसूस कर रहे हैं।

एकाएक राजनीति के केंद्र में आया
बिहार के दरभंगा से पहुंची सोनाक्षी हों या नीट की पूर्व में परीक्षा दे चुके मुंबई से पहुंचे राघव हों। इन आवाज में देश की राजधानी पहुंचकर शिक्षा सुधार जैसे अहम मुद्दा उठाने की हुंकार तो है लेकिन 20 जुलाई से पहले जिसकी सुध लेने कोई नहीं पहुंच रहा था या सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल से पहले इसे महत्वहीन ही माना जा रहा था वो एकाएक राजनीति के केंद्र में आ गया।

संसद, सत्ता पक्ष-विपक्ष सब तरफ हलचल बढ़ गई। किसी भी प्रकार की आस-उम्मीद खो चुके राजनीतिक दल को बैठे-बिठाए मुद्दा मिल गया है, किसी को आगामी राज्य के चुनाव के लिए सारी सियासत अपने देश के सबसे बड़े राज्य के बजाया संसद के बाहर की भीड़ में दिख रही है।
इसीलिए सारा केंद्र सिर्फ इस्तीफा लेने पर ही अडि़ग हो गया है, ना की शिक्षा सुधार की मांग पर।

दीपके पर लगते रहे आरोप
ये भले एकाएक भीड़तंत्र के रूप में व्यापक हुआ दिखता है पर इसकी पठकथा इसके मजाक-मजाक में हुए जन्म के समय से ही लिखी जा रही थी।
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई के दौरान बेरोजगारी और छात्रों के प्रदर्शनों के संदर्भ में एक विवादित टिप्पणी सामने आई, जिसके बाद अभिजीत ने अमेरिका में रहते हुए ही इसे काॅकरोच जनता पार्टी के नाम डिजिटल अभियान के रूप में बनाया।
और अमेरिका से पढ़कर लौटे अभिजीत दीपके पर राजनीतिक दलों से जुड़े होने के आरोप भी लगते रहे हैं।

युवा भीड़ को अब दिशा भी तो चाहिए
दीपके वर्ष 2020 से 2023 के बीच आम आदमी पार्टी के साथ एक स्वयंसेवक और रणनीतिकार के रूप में काम कर चुके हैं। लेकिन आज उनके सामने जंतर-मंतर पर खड़ी 40-50 हजार की युवा भीड़ के लिए कोई दिशा नहीं दिखती है।
वहां सिर्फ एक मांग ‘इस्तीफे’ तक सीमित है। इस्तीफे की जिद, अपनी जगह लेकिन देश के कोने-कोने से पहुंची इस युवा भीड़ को अब दिशा भी तो चाहिए।

जो उम्मीदें बंधी थीं यहां वो बलवति होती नहीं दिखतीं
युवा, देश के उज्जवल भविष्य को दिशा देने या आगे के लिए कोई ट्रैक यहां धूमिल हुआ दिखता है।
इसका अंदाजा आप तीन दिन पहले तक पार्टी के चुनिंदा चेहरों में शामिल रहे विजेता दहिया के पार्टी से निकाले जाने के बाद उनके भीतर की पीड़ा से भी लगा सकते हैं वो जब कहते हैं कि अभिजीत, जब तुम कचौड़ी खाते हो तो मैं बचाव करता हूं और मैंने बर्गर खाया तो मुझे बाहर कर दिया गया।
राजनीतिक बयान और व्यवहार पर सवाल
इनके बर्गर-कचौड़ी जैसे राजनीतिक बयान या राजनीतिक व्यवहार से आप जंतर-मंतर पर पहुंचे युवाओं के नेतृत्व की उम्मीद कर सकते हैं।
इतना ही नहीं, भीड़ में जब अराजक तत्वों के होने की बात पुरजोर तरह से उठने लगी तो सीजेपी के प्रवक्ता सौरभ दास इसे अपने समर्थक नहीं, बल्कि आरोप की राजनीतिक भाषा में भाजपा और आरएएस द्वारा भेजा हुआ बताते हैं।
पार्टी से आ रहे ऐसे ही बयानों पर राजस्थान से मंगलवार, 23 जुलाई को यहां आए 25 वर्षीय शेखर कहते हैं, दूर से देखकर जो उम्मीदें बंधी थीं यहां वो बलवति होती नहीं दिखतीं।

पेपर लीक: सिस्टम की उजागर होती लापरवाही
शिक्षा के तंत्र को जो आस थी, वो इस भीड़ से तो पूरी होती नहीं दिखती। बात चाहे सीबीएसई में तकनीकी खामियों के कारण कापी जांच की हो, नीट परीक्षा सहित देश में किसी भी प्रवेश परीक्षा की हो बार-बार उसमें पेपर लीक होना, सिस्टम की लापरवाहियों को उजागर करता ही है।
नीट केवल एक परीक्षा नहीं है। यह लाखों परिवारों के सपनों, वर्षों की मेहनत और आर्थिक संघर्ष का प्रतीक है। देश के छोटे कस्बों और गांवों से आने वाले विद्यार्थी अपनी जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण साल एक परीक्षा की तैयारी में लगा देते हैं।

माता-पिता के दुख को कौन समझे?
माता-पिता अपनी बचत खर्च कर देते हैं, कई परिवार कर्ज तक ले लेते हैं। ऐसे में जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो टूटता केवल एक परिणाम नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर भरोसा भी होता है, जिस पर भविष्य टिका होता है।
इसी तरह बात चाहे नए सिरे से एनसीईआरटी की किताबों में किए जा रहे बदलावों में उजागर हो खामियों की हो, ये सब शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों के हाथों में तय हो रहा था, फिर इनमें उजागर होती गड़बड़ियां सवाल तो खड़े करती ही हैं, सुधार की मांग गूंजती ही है।

इस आवाज का दब जाना दुर्भाग्यपूर्ण होगा
पीएम मोदी ने भी देश के युवा को विकसित भारत की रीढ़ माना है तो ऐसे रीढ़ बनने वाले आह्वान को कहीं न कहीं ऐसी विसंगतियां तो कमजोर करती ही हैं।
पूरी शिक्षा प्रणाली में जिस बदलाव का आह्वान हुआ उसे सही दिशा के लिए एक समय रहते बदलाव की उठी इस आवाज का राजनीतिकरण और अराजकता में दब जाना देश की युवा पीढ़ी के लिए दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण ही होगा।
‘ऐसा लगता है यहां आकर गलती की, मुझे तो लगा था आज का युवा आवाज उठा रहा है, जिस तरह इसकी शुरुआत हुई थी तो लगा था शिक्षा सुधार की दिशा में मुद्दा बढ़ेगा, जवाबदेही को लेकर मजबूती आएगी लेकिन यहां तो हमारी लड़ाई को “तमाशा” बना दिया है। राजनीति, हुड़दंग सब है सिर्फ सिवाय हमारे मुद्दे के। नेतृत्व विहीन हो गया है। मैं तैयारी कर रहा था प्रतियोगी परीक्षा की, दो बार निराश हो चुका हूं, पेपर लीक हो जाता है। सोचा को यहां से रिफार्म होगा ये लेकिन मैं गलत साबित हुआ।’
– दीपक (22 वर्षीय), बिहार
‘हम हजारों किलोमीटर दूर से अपनी आवाज उठाने आए थे, लेकिन यहां का माहौल देखकर सिर पकड़ लिया। कुछ लोग रील्स बना रहे हैं, कुछ पिज्जा बर्गर खा रहे हैं।
यह कोई गंभीर आंदोलन नहीं, बल्कि वीकडे में भी संडे आउटिंग जैसा स्पाट बन गया है। लग रहा है। हमारी उम्मीदों का तमाशा बन गया है। “इंस्टाग्राम रीलर्स, अराजक लोगों की भेद ने इस आंदोलन को त्रस्त कर दिया, बाकी राजनीति ने इसे अपने लिए ही भुना लिया।’
– तनवी (17 वर्षीय), मुंबई
‘मुझे लगा था कि यहां आकर हमें न्याय की उम्मीद मिलेगी। पर यहां तो लोग सेल्फी लेने और इंटरनेट मीडिया पर ‘चेक-इन’ करने आ रहे हैं। इस रील्स और ब्लागिंग वाले कल्चर ने देश के सबसे जरूरी और अहम शिक्षा के मुद्दे को मजाक बनाकर रख दिया है।
जनरल डिब्बे में धक्के खाकर दिल्ली आया था। सोचा था सरकार तक बात पहुंचेगी। लेकिन यहां के हालात देखकर आज शाम को ही वापस लौटने का फैसला कर लिया। सिस्टम हमारी बात क्या सुनेगा, जब हम खुद इसे पिकनिक मान बैठे हैं। समय और पैसा दोनों बर्बाद हुए।’
– ऋषभ (24 वर्षीय), मध्य प्रदेश
‘ये धरना स्थल है या कोई मेला, जंतर-मंतर की जो छवि जो खबरों में देखी थी, वास्तविकता उससे बिल्कुल अलग है। यह विरोध प्रदर्शन कम और कोई टूरिस्ट स्पाॅट ज्यादा लग रहा है। जब तक यहां सिर्फ भीड़ जुटाने और टाइमपास करने वाले लोग आते रहेंगे, तब तक किसी भी गंभीर आंदोलन का सफल होना नामुमकिन।
वैसे भी यहां आकर लगा इतने अहम मुद्दे की आड़ में काकरोच जनता पार्टी वाले भी अब तो राजनीति कर रहे हैं, उनके पास इतनी भीड़ को आगे लेकर चलने की दिशा नहीं है।’
– संजना (20 वर्षीय), पंजाब












