लखनऊ: राजनीति के गलियारों में एक कहावत मशहूर है कि ‘दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है’। माना जाता है कि जो पार्टी उत्तर प्रदेश में बड़ी जीत हासिल करती है, वह आम तौर पर केंद्र में भी सरकार बनाने में कामयाब होती है। लेकिन जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध-प्रदर्शन ने इस बार समाजवादी पार्टी के लिए इस कहावत को उलट दिया है। जंतर-मंतर पर छात्रों के विरोध में पार्टी के बड़े नेताओं की अचानक सक्रिय भागीदारी ने यूपी में अगले साल होने वाले चुनावों के लिए समाजवादी पार्टी के चुनावी अभियान की नींव रख दी है।
आंदोलन के जोर पकड़ते ही अखिलेश ने दिया समर्थन
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी को विरोध कर रहे युवाओं और छात्रों से जुड़ने में सबसे ज्यादा मदद पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साफ और खुले समर्थन से मिली। वे ऐसे पहले शीर्ष नेता हैं जिन्होंने सबसे पहले 14 जुलाई को सोनम वांगचुक को फोन किया और उनसे अपना अनशन तोड़ने की अपील की।
इसके ठीक 48 घंटे बाद सपा सांसद डिंपल यादव जंतर-मंतर पर वांगचुक के साथ मौजूद थीं। यह पहली बार था जब किसी राजनीतिक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जंतर-मंतर पर मौजूद भीड़ के साथ खुद को जोड़ा और इस पर लोगों का ध्यान गया।
सपा नेताओं ने छात्रों को नहीं होने दिया असहज
एक और बात जो समाजवादी पार्टी के पक्ष में रही, वह यह थी कि उसकी ओर से की गई पहल स्वाभाविक थी और इसमें किसी सुनियोजित राजनीतिक रणनीति की झलक नहीं थी। यह बात छात्रों को पसंद आई और उन्हें आंदोलन में सपा के नेताओं के साथ खड़े होने से कोई असहजता महसूस नहीं हुई।
एक राजनीतिक टिप्पणीकार ने कहा कि इससे पहले, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) कार्यकर्ताओं ने राजनीतिक हस्तियों के प्रति साफ तौर पर नाराजगी दिखाई थी। उन्होंने कहा, इसे संयोग कहें या सोच-समझकर लिया गया फैसला, राजनीतिक पार्टी सपा के किसी प्रतीक के बिना डिंपल का वहां पहुंचना कारगर रहा। वहां न तो उन्होंने खुद और न ही उनके साथ पहुंचे सांसदों ने सपा की पारंपरिक लाल टोपी पहनी थी।
यूपी में भी विरोध प्रदर्शनों ने जोर पकड़ा
लोगों के मन में जंतर-मंतर पर डिंपल की तस्वीरें ताजा ही थीं कि एक दिन बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने लोकसभा के विपक्ष के नेता राहुल गांधी के साथ मिलकर प्रधानमंत्री आवास के पास विरोध-प्रदर्शन किया। अखिलेश की एहतियाती गिरफ्तारी की तस्वीरें सामने आते ही युवा, छात्र और सपा के युवा कार्यकर्ता कारों, एसयूवी और बसों में दिल्ली की ओर दौड़ पड़े। उत्तर प्रदेश में भी विरोध प्रदर्शनों ने और जोर पकड़ लिया।
यूपी में अघोषित रेड अलर्ट
सपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व एमएलसी उदयवीर सिंह ने कहा, राज्य सरकार ने पिछले चार दिनों से अघोषित रेड अलर्ट लागू कर रखा है। पार्टी नेताओं को नजरबंद किया जा रहा है। लेकिन इससे जिला स्तर पर विरोध प्रदर्शनों को रोकने में कोई मदद नहीं मिली, क्योंकि सरकार यह नहीं समझ पाई है कि इस विरोध का नेतृत्व राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं, बल्कि सपा से जुड़े युवा और छात्र कर रहे हैं।
सपा नेता किए गए नजरबंद
पुलिस सूत्रों ने बताया कि दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास के बाहर अखिलेश को हिरासत में लिए जाने के तुरंत बाद जब सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के दिल्ली जाने की खुफिया जानकारी मिली तो जिला पुलिस ने सपा नेताओं को नजरबंद करके लोगों को बड़े पैमाने पर इकट्ठा होने से रोकने की कोशिश की। लेकिन इससे जिला स्तर पर युवाओं और छात्रों के विरोध प्रदर्शन नहीं रुके। चाहे वह बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) हो, वाराणसी का महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ हो, प्रयागराज के सिविल लाइंस का चंद्रशेखर आजाद पार्क हो, या परिवर्तन चौक पर लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्र हों, अलग-अलग जिलों से विरोध प्रदर्शनों की खबरें आ रही थीं। वाराणसी, गाजीपुर, बलिया और आजमगढ़ में भी विरोध प्रदर्शनों की खबर मिली है।
पहले कभी नहीं हुआ ऐसा आंदोलन
ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक इस बात से सहमत हैं कि छात्र विरोध प्रदर्शनों ने देश भर के युवाओं में जोश भर दिया है और आंदोलन में सपा की सक्रिय भागीदारी ने 2027 के चुनावों के लिए पार्टी के चुनावी अभियान की रूपरेखा तैयार कर दी है। एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, भले ही केंद्र सरकार सीजेपी की मांगें मान ले और उसके बाद आंदोलन वापस ले लिया जाए, लेकिन इसने युवाओं को इस तरह से आंदोलित किया है जैसा पहले कभी नहीं देखा गया। उन्होंने कहा कि ऐसे आंदोलनों से पैदा हुआ जोश अक्सर राजनीतिक रंग ले लेता है।










