दिल्ली जंतर-मंतर पर काॅकरोच जनता पार्टी (CJP) और छात्रों का विरोध-प्रदर्शन चल रहा है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती भी यही है कि यहां नागरिक केवल वोट नहीं देता, बल्कि अपनी असहमति भी दर्ज करा सकता है। भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक अधिकार है। अनुच्छेद 19 (1)(a), 19 (1) (b) और 19 (1) (c) हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्वक एकत्र होने और संगठन बनाने का अधिकार देते हैं।
हालांकि, अभी विरोध-प्रदर्शन के बीच कई सवाल भी सामने आ रहे हैं कि विरोध-प्रदर्शन को लेकर क्या अधिकार हैं, संविधान क्या कहता है, नियम क्या हैं और पुलिस कब रोक सकती है? इसकी जानकारी सिर्फ लाॅ स्टूडेंट्स के लिए ही नहीं बल्कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में यहां लाॅ के एक्सपर्ट से जानते हैं डिटेल में।
भारत में विरोध-प्रदर्शन करना वैध और कानूनी है? संविधान से जानें
शारदा यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ लॉ के एसोसिएट प्रोफेसर डाॅक्टर मानवेंद्र सिंह ने बताया कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद-19 हर व्यक्ति नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और संगठन बनाने का अधिकार देता है। इसका अर्थ है कि धरना, रैली, मार्च या भूख हड़ताल जैसे शांतिपूर्ण विरोध भारतीय लोकतंत्र में वैध और संवैधानिक हैं। इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
संविधान ने कभी भी यह नहीं कहा कि विरोध के नाम पर कानून को अपने हाथ में लिया जा सकता है। इसे एक सामान्य उदाहरण से समझिए। आपको अपनी कार चलाने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप लाल बत्ती पार कर दें। उसी प्रकार विरोध करना अधिकार है लेकिन कानून तोड़ना अधिकार नहीं है।
पुलिस कब प्रदर्शन पर रोक लगा सकती है?
संविधान के अनुच्छेद 19 (2) और 19 (3) के तहत राज्य सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, देश की संप्रभुता और अखंडता जैसे वैध कारणों से उचित प्रतिबंध लगा सकता है। विरोध का अधिकार अन्य नागरिकों के अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था के साथ संतुलित होना चाहिए। यहां प्वाइंट्स में समझ लें-
- हिंसा या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका- यदि प्रदर्शन से हिंसा, दंगा या शांति भंग होने की संभावना हो तो पुलिस हस्तक्षेप कर सकती है।
- सार्वजनिक सेवाओं में बाधा– यदि प्रदर्शन के कारण सड़कें, अस्पताल, आपातकालीन सेवाएं या अन्य आवश्यक सार्वजनिक सुविधाएं प्रभावित होती हैं तो प्रशासन प्रदर्शन पर रोक लगा सकता है।
- संपत्ति को नुकसान की आशंका- सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचने की संभावना होने पर भी पुलिस कार्रवाई कर सकती है।
- BNSS की धारा 263 लागू होने पर- यदि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता-2023 (BNSS) की धारा 263 के तहत लोक शांति और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए निषेधाज्ञा लागू हो तो उस क्षेत्र में प्रदर्शन पर रोक लगाई जा सकती है।
भारतीय कानून क्या कहता है?
हाल के दिनों में सोनम वांगचुक का अनशन इस संवैधानिक बहस का नया उदाहरण बनकर सामने आया। उनका शांतिपूर्ण भूख हड़ताल का अधिकार एक ओर था, जबकि दूसरी ओर उनके स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा करने की राज्य की जिम्मेदारी थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि हर नागरिक का जीवन मूल्यवान है, इसलिए सरकार को उनके स्वास्थ्य की नियमित निगरानी करनी चाहिए और चिकित्सकीय आवश्यकता होने पर हस्तक्षेप करना चाहिए।
हालांकि न्यायालय ने सामान्य रूप से जबरन फोर्स-फीडिंग (Force-feeding) का आदेश नहीं दिया, बल्कि चिकित्सा विशेषज्ञों की राय के आधार पर निर्णय लेने की बात कही। इससे यह सिद्ध होता है कि भारतीय कानून व्यक्ति की स्वतंत्रता और जीवन, दोनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करता है।
लोकतंत्र में हैं अधिकार लेकिन नियम भी जरूरी
इसी प्रकार कुछ साल पहले किसानों के आंदोलन, शाहीन बाग प्रकरण और अन्य छात्र आंदोलनों ने भी यह प्रश्न उठाया कि विरोध कहां तक जायज है। सर्वोच्च न्यायालय ने शाहीन बाग (Shaheen Bagh) मामले में स्पष्ट कहा था कि लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है लेकिन सार्वजनिक मार्गों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा करके दूसरों के अधिकारों को बाधित नहीं किया जा सकता। संदेश साफ था कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है लेकिन दूसरे नागरिकों के अधिकारों की कीमत पर नहीं।
संविधान कहता है- लोकतंत्र की शक्ति है शांतिपूर्ण विरोध
एक समय भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या का प्रयास अपराध था। लेकिन मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम-2017 (Mental Healthcare Act-2017) की धारा 115 ने भारतीय विधि की सोच बदल दी। इस प्रावधान के अनुसार यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करता है तो यह माना जाएगा कि वह गंभीर मानसिक तनाव (Severe Stress) में था और उसे दंडित करने के बजाय उपचार, परामर्श और देखभाल उपलब्ध कराई जानी चाहिए। यानी कानून का दृष्टिकोण दंडात्मक से अधिक मानवीय हो गया।
भारतीय न्याय संहिता-2023 (BNS) में धारा 226 एक विशेष स्थिति को अपराध बनाती है, जहां कोई व्यक्ति लोक सेवक को उसके वैधानिक कर्तव्य से रोकने या बाध्य करने के उद्देश्य से आत्महत्या या आत्महत्या का प्रयास करने की धमकी देता है या ऐसा प्रयास करता है। इसलिए हर भूख हड़ताल को स्वतः आत्महत्या का प्रयास नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि कानूनी विशेषज्ञों का मत है कि लोकतांत्रिक विरोध स्वरूप किया गया अनशन और आत्महत्या का प्रयास, दोनों समान अवधारणाएं नहीं हैं। संविधान का संदेश स्पष्ट है कि अधिकार और उत्तरदायित्व एक-दूसरे के पूरक हैं। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की शक्ति है, जबकि संवाद और संवैधानिक मर्यादा उसकी पहचान।










