महेन्द्र पांडे
उत्तर प्रदेश की आत्ममुग्ध और दमनकारी सरकार ने विज्ञापनों पर बेइन्तेहा खर्च कर विकास की जो भी रंगीन परिभाषा देश के सामने प्रस्तुत की हो, पर पोषण और स्वास्थ्य के तमाम सरकारी आंकड़ों में आदित्यनाथ का तथाकथित ‘उत्तम प्रदेश’ एक निहायत ही पिछड़ा प्रदेश है।आदित्यनाथ के तथाकथित विकास के दावे एयरपोर्ट, एक्स्प्रेसवे, भारी भरकम निवेश के हसीन सपने, बुलडोजर न्याय, जघन्य पुलिसिया इनकाउंटर, सच उजागर करने वालों का दमन और सामाजिक ध्रुवीकरण तक सीमित हैं– इसमें जनता बेबस और लाचार है।
जिस प्रदेश के 19 करोड़ लोग मुफ्त के 5 किलो अनाज पर जिंदा हों, वहां विकास शब्द ही बेशर्म बन जाता है।सरकार को भी अपने विकास की हकीकत मालूम है, तभी महिलाओं को चुनाव से ठीक पहले 50,000 रुपये के रिश्वत देने की योजना बनाई जा रही है।
यूपी में कैलोरी अंतर्ग्रहण देश के औसत से बहुत कम
पोषण का स्तर जानने का एक सरल तरीका सामान्य आबादी द्वारा हरेक दिन भोजन के साथ शरीर को उपलबद्ध होने वाली कैलोरी का आकलन है। उत्तर प्रदेश में कैलोरी का अंतर्ग्रहण देश के औसत की तुलना में बहुत कम है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जून 2025 में प्रकाशित एन एस एस रिपोर्ट संख्या 594, भारत में पौष्टिक अंतर्ग्रहण (2022-23 और 2023-24), के अनुसार, वर्ष 2023-24 में देश का औसत कैलोरी अंतर्ग्रहण ग्रामीण क्षेत्रों में 2212 किलोकैलोरी प्रतिदिन और शहरी क्षेत्रों में 2240 किलोकैलोरी प्रतिदिन था।इसकी तुलना में उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा क्रमशः 2086 और 2080 किलोकैलोरी प्रतिदिन ही था।
विज्ञापनों की चकाचौंध ने पोषण को कुपोषण में बदल दिया
इस रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में कैलोरी अंतर्ग्रहण लगातार शहरी क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक रहा है। पूरे प्रदेश के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों, दोनों में वर्ष 2009-10 से 2011-12 के बीच कैलोरी अंतर्ग्रहण प्रभावी तौर पर बढ़ा और फिर इसके बाद यह लगातार कम होता जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि जब तक उत्तर प्रदेश में तथाकथित विकास का रंगीन विज्ञापन नहीं था तब तक प्रदेश में पोषण का स्तर बढ़ता रहा, और फिर विज्ञापनों की चकाचौंध ने पोषण को कुपोषण में तब्दील कर दिया।
वर्ष 2009-10 में ग्रामीण क्षेत्रों में कैलोरी अंतर्ग्रहण 2181 किलोकैलोरी प्रतिदिन था, जो वर्ष 2011-12 तक 2548 किलोकैलोरी तक पहुंच गया। अगले 10 वर्षों में, यानी 2022-23 तक ग्रामीण क्षेत्रों में कैलोरी अंतर्ग्रहण तेजी से घटकर 2118 किलोकैलोरी तक और फिर 2023-24 में और घटकर 2086 किलोकैलोरी प्रतिदिन तक पहुंच गया। ठीक यही हाल शहरी क्षेत्रों का भी है। इन क्षेत्रों में वर्ष 2009-10, 2011-12, 2022-23 और वर्ष 2023-24 में कैलोरी अंतर्ग्रहण क्रमशः 2072, 2363, 2084 और 2080 किलोकैलोरी प्रतिदिन है।
यूपी में महिलाओं के स्वास्थ्य का बुरा हाल
कैलोरी अंतर्ग्रहण में गिरावट का सीधा असर 15 से 49 वर्ष की महिलाओं के बॉडी-मास इंडेक्स (Body Mass Index) पर पड़ रहा है। बॉडी मास इंडेक्स जब 18.5 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर से कम रहता है तब यह खतरनाक होता है, सीधे शब्दों में इसे कमजोर शरीर कह सकते हैं।महिलाओं के लिए यह अधिक खतरनाक होता है क्योंकि उन्हें परिवार संभालने के साथ ही गर्भधारण और शिशु की देखभाल भी करनी होती है।
पूरे देश में सामान्य से कम बॉडी मास इंडेक्स वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है, पर उत्तर प्रदेश में ऐसी महिलाओं की संख्या राष्ट्रीय औसत से अधिक तेज है। इस संबंध में आंकड़े इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइन्सेज की रिपोर्ट “राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण– 6: 2023-24– फैक्ट शीट्स” और “राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण– 6, कम्पेन्डीयम ऑफ फैक्ट शीट्स, उत्तर प्रदेश” में विस्तार से उपलब्ध हैं। यह सर्वेक्षण भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए तैयार किया जाता है।
भारत में वर्ष 2021 में सामान्य से कम बॉडी मास इंडेक्स वाली महिलाओं की संख्या 18.7 प्रतिशत थी, पर वर्ष 2024 तक यह आंकड़ा 19.7 प्रतिशत तक पहुंच गया। वर्ष 2021 में उत्तर प्रदेश के महिलाओं की स्थिति राष्ट्रीय औसत जैसी, यानि 19.0 प्रतिशत थी पर वर्ष 2024 तक प्रदेश की 22.2 प्रतिशत महिलायें बॉडी मास इंडेक्स में पिछड़ गईं। उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों की स्थिति तो इस मामले में बहुत दयनीय है- खीरी में 34.9 प्रतिशत, सीतापुर में 34.5, हमीरपुर में 33.9, हरदोई में 31.0, सोनभद्र में 30.6 और महोबा में 30.3 प्रतिशत महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स सामान्य से कम है।
राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण– 5 (2019-21) के अनुसार, देश की 15 से 49 वर्ष की गर्भवती महिलाओं में से 52.2 प्रतिशत और इस आयु वर्ग की सभी महिलाओं में से 57 प्रतिशत एनीमिया, यानि खून की कमी से ग्रस्त हैं। एक खतरनाक तथ्य यह है कि एनीमिया ग्रस्त महिलाओं की संख्या वर्ष 2015-16 के राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण– 4 के बाद से बढ़ गई है। इस सर्वेक्षण में 50.4 प्रतिशत गर्भवती महिलायें और 53.1 प्रतिशत सामान्य महिलायें एनीमिया की चपेट में थीं। उत्तर प्रदेश में भी यही स्थिति है– सर्वेक्षण 4 में 50.4 प्रतिशत महिलायें एनीमिया की चपेट में थीं और सर्वेक्षण 5 में यह आंकड़ा 52.4 प्रतिशत तक पहुंच गया। एनीमिया का मुख्य कारण कुपोषण है।
“राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण– 6, कम्पेन्डीयम ऑफ फैक्ट शीट्स, उत्तर प्रदेश” के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 13.7 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हो जाता है, और 3.5 प्रतिशत महिलायें 15 से 19 वर्ष के बीच की आयु में मां भी बन जाती हैं। 15 से 24 वर्ष के बीच की 69.2 प्रतिशत महिलायें माहवारी के दौरान सुरक्षित तरीके अपनाती हैं– यह आंकड़ा गिरता जा रहा है, वर्ष 2019-21 के सर्वेक्षण में यह आंकड़ा 72.9 प्रतिशत था। 18 से 49 वर्ष के आयु वर्ग की 28.5 प्रतिशत महिलायें घरेलू हिंसा का और 0.5 प्रतिशत महिलायें यौन हिंसा का सामना करती हैं। 18 वर्ष से अधिक आयु की 9.6 प्रतिशत महिलायें तंबाकू का और 0.3 प्रतिशत महिलायें शराब का सेवन करती हैं। तंबाकू का सेवन करने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है।
महिलायें पहले से अधिक कुपोषित होती जा रही हैं
तथाकथित डबल इंजन बीजेपी सरकारें जहां भी हैं, वहां सामाजिक और आर्थिक विकास के नाम पर कुछ भी नहीं किया जा रहा है। बड़ी-बड़ी योजनाओं का शुभारंभ होता है, कई दिनों तक पूरे पृष्ठ के सरकारी रंगीन विज्ञापन प्रकाशित किए जाते हैं, आईटी सेल इसके बारे में भ्रामक जानकारी फैलाता है– और जनता पहले से भी अधिक उपेक्षित और कमजोर रह जाती है। चुनाव जब आते हैं, तब विकास का नहीं बल्कि रिश्वत का पासा फेंका जाता है। इससे भी बात नहीं बनती तो चुनाव आयोग तो सत्ता का ही है। महिलाओं की योजना में इन्हें आधी आबादी बताया जाता है और आरक्षण में एक-तिहाई का डंका बजता है। महिलाओं को सत्ता की सीढ़ी में तब्दील कर दिया गया है, और यही महिलायें पहले से अधिक कुपोषित और लाचार होती जा रही हैं।












