पीलीभीत। रोजगार न मिलने के कारण जन्मभूमि से सैकड़ों किमी दूर बड़े शहरों में जाकर श्रमिकों ने अपने खून पसीने से सींचकर अपनी कर्मभूमि बनाई। लेकिन कोरोनावायरस महामारी ने फिर उन्हें जन्मभूमि की तरफ लौटने को मजबूर कर दिया। अब जब वे अपने गांव-घर लौट आए हैं तो उनके हाथ खाली है। अब उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा है कि आगे की जिंदगी कैसे कटेगी? इसी किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति से निकालने के लिए गांव में ही रोजगार देने की योजना बनाई है। लेकिन उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले में रोजगार के नाम पर आंकड़ेबाजी शुरू हो गई है। ऐसे में मजदूर सिर्फ मजबूर बनकर रह गया है।
606 ग्राम पंचायत में चल रहा काम
डीएम वैभव श्रीवास्तव के अनुसार, पीलीभीत जिले में 721 ग्राम पंचायत है। जिसमें से 606 ग्राम पंचायतों में मनरेगा के तहत काम चल रहा है। इसके जरिए 10 हजार से ज्यादा मजदूर काम कर रहे हैं। लेकिन मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) सीमा अग्रवाल के बयान के बाद भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है। सीएमओ ने बताया कि, लॉकडाउन के बीच 25000 से ज्यादा प्रवासी मजदूर जिले में आए हैं। जिन्हें संस्थागत और होम क्वारैंटाइन किया गया। 25 मई तक करीब 8500 प्रवासी मजदूरों ने अपना क्वारैंटाइन पीरियड पूरा किया है। ऐसे में जिलाधिकारी का ये कहना कि 10000 से ज्यादा प्रवासी मजदूरों को मनरेगा के तहत काम दिया गया है। ये सिर्फ आंकडो की बाजीगरी लगता है।
सीएमओ के अनुसार 8500 प्रवासी मजदूरों ने पूरा किया क्वारैंटाइन
बकौल, सीएमओ यदि 8500 प्रवासी मजदूरों ने ही क्वारैंटाइन पीरियड पूरा किया तो 10000 से ज्यादा प्रवासी मजदूरों को काम कैसे दिया गया। अब सवाल ये है कि 2000 के लगभग प्रवासी मजदूर बिना क्वारैंटाइन पूरा किए बगैर मनरेगा की मजदूरी करने लगे हैं। अगर ऐसा है तो यदि किसी में कोरोनावायरस के लक्षण या उनमें बीमारी हुई तो अन्य के भी संक्रमित होने का खतरा है। अगर ऐसा नहीं है तो क्या जिला प्रशासन रोजगार देने के नाम पर आंकड़ों की बाजीगारी कर अपनी पीठ थपथपा रहा है।













