कोई भी दर्ज करा सकता है केस’, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान… अब नहीं खैर

नई दिल्ली। आए दिन सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया जाता है और नष्ट किया जाता है। लेकिन शिकायत दर्ज कराने वाले व्यक्ति के कानूनन शिकायत करने के लिए अधिकृत नहीं होने को आधार बनाकर संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले बच निकलते थे। अब उनका ऐसे बच निकलना मुश्किल होगा।

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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पर कोई भी व्यक्ति शिकायत दर्ज करा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984 में ऐसा कोई विशेष प्रविधान नहीं है, जो शिकायतकर्ता की पात्रता को सीमित करता हो। यानी शिकायत कौन कर सकता है, ऐसा विशेष रूप से उल्लेखित नहीं है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश किया खारिज

मालूम हो कि इस कानून के तहत जेल तक की सजा का प्रविधान है। जस्टिस पंकज मित्तल और प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने गत 18 नवंबर को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के एक मामले में लाल चंद्र राम की अपील स्वीकार करते हुए यह महत्वपूर्ण आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अभियुक्तों के खिलाफ आजमगढ़ की विशेष अदालत से जारी समन रद करने का इलाहाबाद हाई कोर्ट का 24 सितंबर, 2024 का आदेश खारिज कर दिया है।

पीठ ने आदेश में कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व फैसलों में कहा जा चुका है कि ऐसा कोई कानून नहीं है, जो किसी व्यक्ति को शिकायत करने से रोकता हो। पीठ ने खास तौर पर डॉक्टर सुब्रह्मण्यम स्वामी बनाम डॉक्टर मनमोहन सिंह के मामले में 2012 में दिए गए फैसले का जिक्र किया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीआरपीसी में कोई ऐसा प्रविधान नहीं है जो किसी नागरिक को अपराध करने वाले किसी लोकसेवक या किसी भी अन्य व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए शिकायत करने से रोकता हो।

उस फैसले में यह भी कहा गया था कि आपराधिक न्यायशास्त्र का एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि कोई भी व्यक्ति क्रिमिनल ला को मोशन में ला सकता है, सिवाय तब जबकि अपराध को लागू करने या बनाने वाला कानून स्पष्ट रूप से इसके विरुद्ध न हो।

पीठ ने आदेश में क्या कहा?

पीठ ने आदेश में कहा कि मौजूदा मामले को देखा जाए तो सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 में ऐसा कोई विशेष प्रविधान नहीं है जो शिकायतकर्ता की पात्रता को सीमित करता हो। यानी शिकायत कौन कर सकता है ऐसा विशेष रूप से उल्लेखित नहीं है।

यहां तक कि कोर्ट ने आजमगढ़ के थाना सिधारी के इस मामले में पीडीपीए एक्ट के अलावा अन्य कानूनों के तहत लिए गए संज्ञान और जारी समन पर कहा कि आरोपपत्र में दिए गए कानूनों में इस सिद्धांत के खिलाफ कोई संकेत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट का यह मानना गलत है कि ग्राम प्रधान एफआइआर दर्ज कराने के लिए सक्षम अथारिटी नहीं था। इसलिए विशेष जज का उसके आधार पर संज्ञान लेना और अभियुक्तों को समन जारी करना कानूनन गलत है।

क्या था मामला?

इस मामले में ग्राम प्रधान की शिकायत पर अभियुक्तों नौशाद एवं अन्य के खिलाफ एफआइआर दर्ज हुई। इसके बाद पुलिस ने अभियुक्तों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 323, 504, 506 और एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर), 3(1)(एस), 3(2)(वीए) तथा प्रिवेंशन आफ डैमेज टु पब्लिक प्रापर्टी एक्ट 1984 की धारा 3/4 के तहत अदालत में आरोपपत्र दाखिल हुआ।

आजमगढ़ के विशेष न्यायाधीश ने आरोपपत्र पर संज्ञान लेते हुए अभियुक्तों को समन जारी किया, जिसे हाई कोर्ट में अपील के जरिये चुनौती दी गई। हाई कोर्ट ने यह कहते हुए समन आदेश रद कर दिया कि ग्राम प्रधान को एफआईआर दर्ज कराने का अधिकार ही नहीं था।

हाई कोर्ट ने आदेश में कहा था कि यूपी रेवेन्यू कोड 2006 की धारा 67 और 136 कहती है कि भूमि प्रबंधक समिति या अन्य अथारिटी या संबंधित लेखपाल कानून में तय प्रक्रिया के तहत संबंधित सहायक कलेक्टर को सूचित करेंगे न कि ग्राम प्रधान स्वयं से कार्रवाई करे।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश खारिज करते हुए कहा है कि यूपी रेवेन्यू एक्ट की ये धाराएं दीवानी प्रकृति की हैं और ये पूर्णता भिन्न संदर्भ में लागू होती हैं, जिसमें सार्वजनिक संपत्ति को पहुंची क्षति का आकलन करना होता है या संपत्ति पर जबरन घुसने वाले को बेदखल करना होता है।

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