अगर व्हाइट हाउस पर हमला होता…तब हम और दुनिया क्या कहती?

इस विचार-प्रयोग पर गौर करें। मान लें कि दो बड़ी मिसाइलें व्हाइट हाउस से टकरा गईं। पहली मिसाइल रिहायशी हिस्से पर उस समय गिरी, जब पूरा परिवार घर पर ही मौजूद था, यानी राष्ट्रपति ट्रंप, उनकी पत्नी मेलानिया, उनके बेटे डोनाल्ड और एरिक, उनकी पत्नियां और उनके बच्चे। कल्पना कीजिए कि पहली मिसाइल के हमले में वे सभी मारे गए, एक-एक करके सब। और दूसरी मिसाइल ठीक उस समय गिरी, जब बचाव दल के लोग परिवार की मदद के लिए वहां पहुंचे थे; और उस मिसाइल ने उन सभी को भी मार डाला।

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इसके बाद, कल्पना कीजिए कि ट्रंप की कैबिनेट के सदस्य अपने घरों में, अपने परिवारों के साथ मर रहे हैं। विदेश मंत्री (जिसे वे ‘सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट’ कहते हैं) रूबियो, रक्षा मंत्री पीटर हेगसेथ, और अन्य लोग जो आमतौर पर ट्रंप के आस-पास दिखाई देते हैं।

और इसके बाद, उन्हीं लोगों के बारे में सोचिए जिन्होंने यह सब किया, एक अमेरिकी स्कूल पर हमला किया और 150 से ज़्यादा स्कूली छात्राओं को मार डाला।

अमेरिका के पास इतिहास की सबसे बड़ी नौसेना है। इसके पास 11 विशाल विमानवाहक पोत हैं, जिनमें से हर एक के साथ सहायता के लिए एक दर्जन या उससे अधिक जहाज़ जुड़े होते हैं। और ज़रा कल्पना कीजिए कि बिना किसी युद्ध की घोषणा के, उसी देश या संस्था ने, जिसने ऊपर बताए गए उन सभी लोगों को मारा था — चुपके से अमेरिका के एक महान युद्धपोत पर टॉरपीडो से हमला करके उसे डुबो दिया, जिससे उस पर सवार अधिकांश नाविक मारे गए।

ये सब पढ़ने वालों को इन बातों पर विचार करने के लिए ज़्यादा कल्पना शक्ति की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि ये सारी बातें असल में ईरानियों के साथ घटी थीं। और ये सब अमेरिकियों के हाथों हुआ था। अगर ऊपर लिखे ये शब्द आपको कुछ अटपटे लग रहे हैं, तो इसकी वजह यह है कि हमें अमेरिकियों के बारे में उस तरह से सोचने की आदत नहीं है, जिस तरह से हमें ईरानियों के बारे में सोचने की आदत है। यह बात खास तौर पर उस अंग्रेज़ी भाषी दुनिया के लिए सच है जिसका हम भी हिस्सा हैं, लेकिन आम तौर पर यह बात लगभग हर जगह सच है।

ईरान को लगातार ‘राक्षस’ की तरह पेश करने और उसे बदनाम करने की वजह से (जैसा कि इराक, अफगानिस्तान, रूस वगैरह के मामले में हुआ था), हम उनके प्रति वैसी सहानुभूति नहीं रख पाते, जैसी हम अमेरिकियों के लिए रखते हैं।

अब हमारे इस ‘विचार-प्रयोग’ को एक तरफ रख दें, और उन शर्तों की इन दो सूचियों पर गौर करें, जिन्हें दोनों पक्षों ने युद्ध खत्म करने के लिए सामने रखा है।

अमेरिकियों की सूची में 15 बिंदु हैं। ये इस प्रकार हैं:

1. ईरान को अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से बंद करना होगा

2. यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह से रोकना होगा

3. अमेरिका को इसकी बेरोकटोक जांच की अनुमति देनी होगी

4. बैलिस्टिक मिसाइल विकास रोकना होगा

5. सैन्य क्षमताओं को कम करना होगा

6. फिलिस्तीन और लेबनान में समूहों को समर्थन देना बंद करना होगा

7. विदेशों में अपना प्रभाव समाप्त करना होगा

8. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का नियंत्रण छोड़ना होगा

9. जहाजरानी मार्गों (शिपिंग रूट्स) पर नियंत्रण छोड़ना होगा

10. खाड़ी में अमेरिकी सहयोगियों पर हमले बंद करने होंगे

11. क्षेत्र में युद्ध को कम करना होगा

12. अमेरिका के नेतृत्व वाली वार्ताओं को स्वीकार करना होगा

13. दीर्घकालिक निगरानी और अनुपालन की शर्तों को स्वीकार करना होगा

14. हथियारों के हस्तांतरण को सीमित करना होगा

15. भविष्य में अपना व्यवहार बदलना होगा

ईरान ने भी पांच शर्तों की एक सूची तैयार की है। जो इस प्रकार हैं:

1. ईरानी नेताओं की हत्याएं बंद होनी चाहिए।

2. भविष्य में कोई युद्ध न होने की गारंटी।

3. इस युद्ध से हुए नुकसान के लिए मुआवज़ा।

4. इस क्षेत्र में इज़राइल के व्यापक युद्ध का अंत।

5. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ पर ईरान के संप्रभु अधिकारों की मान्यता।

यहाँ हम कुछ बातों पर गौर कर सकते हैं। ईरानी सूची में कुछ तत्व नदारद हैं, हालांकि उनके बारे में उन्होंने खुद बात की है और दुनिया ने भी उन्हें सुना है। भारत, पाकिस्तान और तो और अमेरिका और इज़राइल की ही तरह, ईरान को भी एक शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम का अधिकार है, जिसमें यूरेनियम संवर्धन भी शामिल है। उन्होंने इसे सूची से बाहर क्यों रखा है? शायद इसलिए, ताकि दुनिया को यह न लगे कि ईरान के साथ बाकी देशों से अलग बर्ताव किया जाना चाहिए या ऐसा करना संभव है।

इसके अलावा, ईरान की सूची बचाव वाली ज्यादा लगती है, और उन लोगों से कोई मांग नहीं करती जिन्होंने उस पर युद्ध थोपा है। अमेरिकी सूची के बारे में, जिसकी पुष्टि ट्रंप ने की है, क्या कहा जा सकता है? बस यही कि यह आक्रामक, अतिवादी और बेतुकी है। आक्रामक इस अर्थ में कि यह धमकी भरी है; अतिवादी इस अर्थ में कि यह बातचीत के लिए किसी भी तरह से कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती।

और बेतुकी इसलिए, क्योंकि यह मानकर चलती है कि अमेरिका और इज़राइल इस समय इस संघर्ष की दिशा तय करने की स्थिति में हैं, जबकि वे ऐसी स्थिति में नहीं हैं। इसी कारण से—दुर्भाग्यवश, इस संघर्ष और इसके प्रभावों से जुड़े सभी लोगों के लिए (जिनमें हम भी शामिल हैं)—इस पीड़ा के जल्द समाप्त होने की कोई उम्मीद नहीं है।

अब एक आखिरी बात पर गौर करें। अगर सच में वही हुआ होता जिससे हमने शुरुआत की थी। यानी अमेरिका और ट्रंप और उनके परिवार और उनके मंत्रियों और अमेरिकी स्कूली लड़कियों और नाविकों की बिना उकसावे के हत्या कर दी गई होती, तो क्या हमारे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री वही बातें कहते और करते जो उन्होंने 28 फरवरी के बाद से की हैं? मुझे शक है कि ऐसा होता।

जब हम ‘वसुधैव कुटुंबकम’ कहते हैं, तो क्या हमारा सचमुच यही मतलब होता है कि भारत की समझ यह है कि वह पूरी दुनिया और उसमें रहने वाले सभी लोगों को एक ही परिवार माने? इसका जवाब है—नहीं; क्योंकि भारत अपनी बातों से नहीं, बल्कि अपने कामों से यह बात साफ़ और स्पष्ट रूप से दिखाता है। दुनिया में एक क्रम-व्यवस्था होती है—ठीक वैसे ही, जैसे किसी परिवार में नज़दीकी सदस्य होते हैं, तो दूर की बुआएं, भुला दिए गए चाचा और नापसंद चचेरे भाई-बहन भी होते हैं।

जो रिश्तेदार भौगोलिक रूप से काफ़ी करीब हैं (1947 तक ईरान और भारत की सीमाएं आपस में जुड़ी हुई थीं), लेकिन मानसिक रूप से दूर हैं—उन्हें एक तरफ़ किया जा सकता है और उनकी तकलीफों और उन पर हुए हमलों को नज़रअंदाज़ किया जा सकता है; जैसा कि हमने ईरान के मामले में पूरी तरह से किया है।

मैं इस संकट से निपटने के किसी नए तरीके की वकालत नहीं कर रहा हूं—यह काम कहीं और किया जा सकता है, कम से कम इस लेख में तो नहीं। मैं तो बस इतनी सी गुज़ारिश कर रहा हूँ कि जब हम दुनिया को और उसमें आज हो रही घटनाओं को देखें, तो उन पूर्वाग्रहों और पक्षपातों पर भी गौर करें जिनका बोझ हमने खुद पर लाद रखा है।

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