छत्रपति शिवाजी महाराज महाराष्ट्र के सबसे लोकप्रिय शासक हैं। इन दिनों देश के अन्य इलाकों में उन्हें एक शीर्ष हिन्दू राष्ट्रवादी नायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्हें लेकर कई बार विवाद खड़े हो चुके हैं। शिवाजी की लोकप्रियता समाज के किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है। वे कई वर्गों के प्रिय हैं। उनकी जयंती पूरे राज्य में धूमधाम से मनाई जाती है और राज्य के सभी भागों में उनका यशोगान करने वाले पावड़े (लोकगीत) गाए जाते हैं। उन्हें लेकर विवाद इसलिए सामने आते हैं क्योंकि समाज के विभिन्न वर्ग उनकी जीवन और उनके कार्यों की व्याख्या अलग-अलग ढंग से करते हैं।
उनके संबंध में एक विवाद इस मुद्दे पर हुआ था कि उनकी प्रतिमा की स्थापना के लिए गठित समिति का प्रमुख बाबासाहेब पुरंदरे को बनाया गया था। कई लोगों का आरोप था कि पुरंदरे, शिवाजी को ब्राम्हणवादी रंग में पेश कर रहे हैं। एक अन्य विवाद तब खड़ा हुआ जब मानवाधिकार कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड द्वारा तैयार की गई इतिहास की पुस्तिका में बताया गया कि ब्राम्हणों ने उनका राज्याभिषेक करने से इंकार कर दिया था क्योंकि वे क्षत्रिय नहीं थे। एक बार गणेशोत्सव के दौरान प्रदर्शित की गई एक झांकी में शिवाजी को अफजल खान पर खंजर से वार करते दिखाया गया था, जिससे समाज के एक बड़े वर्ग में नफरत भड़की।
इस समय दो मुद्दों को लेकर विवाद जारी है। पहला है- आरएसएस के नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में बागेश्वरधाम बाबा द्वारा दिया गया भाषण। उल्लेखनीय है कि धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री नामक ये बाबा लोगों को अपना अनुयायी बनाने के लिए अंधविश्वास बढ़ाने वाले तौर-तरीके अपनाते हैं। वे एक पर्ची निकालते हैं और तरह-तरह की तरकीबों का इस्तेमाल कर लोगों को उनके व्यक्तिगत जीवन से संबंधित में जानकारियां देते हैं।
उनके अनुयायियों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई तक उनका आशीर्वाद लेने सपरिवार उनसे मिलने गए। अंधविश्वास-विरोधी कार्यकर्ता श्याम मानव का कहना है कि केन्द्र में बीजेपी के सत्तारूढ़ होने के बाद से अंधविश्वास में बढ़ोत्तरी हुई है और तरह-तरह के बाबा बड़ी संख्या में पनप रहे हैं।
आरएसएस के कार्यक्रम में इस ढोंगी बाबा ने कहा कि शिवाजी महाराज युद्ध लड़ते-लड़ते थक गए थे इसलिए वे अपने गुरू समर्थ स्वामी रामदास के पास गए और उन्होंने अपना मुकुट उनके चरणों में रखते हुए उनसे अपना साम्राज्य संभालने का अनुरोध किया। इस वक्तव्य में दो बड़ी गलतियां थीं। पहली, रामदास शिवाजी के गुरू नहीं थे।
यह ब्राम्हणवादियों द्वारा फैलाया गया झूठ है। यह मामला अदालत तक गया था जिसने यह फैसला दिया कि रामदास, शिवाजी के गुरू नहीं थे। शिवाजी के जीवन में ऐसी कोई घटना का जिक्र नहीं मिलता। यह वक्तव्य आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस की मौजूदगी में दिया गया और इनमें से किसी ने भी इस पर आपत्ति दर्ज नहीं करवाई।
जब इस मुद्दे पर शोर-शराबा हुआ तो बाबा ने यह कहते हुए माफी मांग ली कि वे हिन्दू राष्ट्र के संबंध में अन्य बातों के अलावा शिवाजी के हिन्दवी स्वराज से भी प्रेरणा पाते हैं। यह दूसरा झूठ था। शिवाजी का हिन्दवी स्वराज भौगोलिक इलाके से संबंधित था। हिन्द से आशय भौगोलिक क्षेत्र से था, ना कि किसी धर्म से। शिवाजी के जीवन से भी इसकी पुष्टि होती है। वे सभी धर्मों का सम्मान करते थे। उनकी सेना में सिद्धि संबल, इब्राहिम गर्दी और दौलत खान सहित करीब 12 मुस्लिम जनरल थे।
उन्होंने रायगढ़ के अपने किले में अपने मुस्लिम अधिकारियों और प्रजा के लिए एक मस्जिद बनवाई थी। मौलाना हैदर अली उनके विश्वसनीय सचिव थे। वे महिलाओं का दिल से सम्मान करते थे। उनके सैनिक बसेन के मुस्लिम शासक की सुंदर पुत्रवधु को उनके पास तोहफे के तौर पर लेकर आए। लेकिन उनका नैतिक चरित्र इतना उच्च था कि उन्होंने उसे पूर्ण सम्मान के साथ उसके परिवार के पास वापस भिजवा दिया। बागेश्वरधाम बाबा की टिप्पणी जिस ब्राम्हणवादी नजरिए पर आधारित थी, उसी आख्यान को आरएसएस बढ़ावा देती है।
दूसरे विवाद का संबंध बीजेपी के सहयोगी दल शिवसेना (एकनाथ शिन्दे) के बुलढ़ाना से विधायक संजय गायकवाड़ से है। गायकवाड़ ने यह धमकी देकर विवाद खड़ा कर दिया कि वे 1988 में प्रकाशित गोविन्द पानसरे की पुस्तक “शिवाजी कोण होता?” (शिवाजी कौन थे?) को लेकर उसके प्रकाशक की जीभ काट देंगे। गायकवाड़ को पुस्तक के शीर्षक में शिवाजी महाराज को केवल शिवाजी लिखने और उसमें इतिहास को, उनके अनुसार, तोड़मरोड़कर पेश करने पर आपत्ति थी। उन्होंने पुस्तक के वितरक प्रशांत अंबी को बुलाकर उन्हें धमकी दी कि उनका वही हाल होगा जो गोविंद पानसरे का हुआ था।
ज्ञातव्य है कि गोविन्द पानसरे की सुबह की सैर के दौरान हत्या कर दी गई थी़। कत्ल की साजिश से जुड़े ज्यादातर लोग हिन्दू राष्ट्रवादी समूहों से संबंधित थे। आरोप है कि फोन पर गायकवाड़ ने गाली-गलौज भरी भाषा का इस्तेमाल किया और कोल्हापुर निवासी प्रकाशक प्रशांत अंबी को धमकाया कि “तुम्हारा भी पानसरे जैसा अंजाम होगा‘‘। इस बातचीत की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है।
यह पुस्तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और तर्कवादी कार्यकर्ता गोविंद पानसरे ने गहन एवं विस्तृत शोध के बाद लिखी थी और मराठी में इसका शीर्षक रखा था ‘शिवाजी कोण होता‘। केवल नाम से सबसे घनिष्ठ लोगों को ही संबोधित किया जाता है। गायकवाड़ इस पर आपत्ति कर रहे हैं और इसे शिवाजी का अपमान बता रहे हैं। यह पुस्तक सन् 1988 में प्रकाशित हुई थी और अब तक इसकी लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं और इसे कई भाषाओं में अनुदित किया जा चुका है।
एक तरह से यह सामान्य लोगों के लिए शिवाजी के बारे में एक आधारभूत पुस्तक बन गई है। इसमें शिवाजी के रैयत (निर्धन किसानों) के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैये और सभी धर्मों के प्रति सम्मान को दर्शाया गया है। उनके दादा मालोजी राव भोंसले ने संतान प्राप्ति हेतु एक सूफी संत (शाह शरीफ) की दरगाह पर दुआ मांगी थी क्योंकि वे संतानहीन थे। बाद में जब उनके दो पुत्र हुए तो उन्होंने उनका नाम शाहजी और शरीफजी रखा। शिवाजी, शाहजी भोसले के पुत्र थे।
शिवाजी ने अपना साम्राज्य चन्द्र राव मोरे जैसे अपने पड़ोसी हिन्दू राजाओं पर आक्रमण करके स्थापित किया। आदिल शाह के सेनापति अफजल खान के साथ हुई लड़ाई में शिवाजी के मुस्लिम अंगरक्षक रूस्तम-ए-ज़मां ने उन्हें वह लोहे का पंजा दिया था, जिससे उन्होंने अफज़ल खान को मारा था। मजे की बात यह है कि अफजल खान ने शिवाजी की पराजय के लिए स्थानीय ब्राम्हणों से यज्ञ करवाया था और उनके सचिव कृष्णाजी भास्कर कुलकर्णी थे!
शिवाजी बेजोड़ मानवीय मूल्यों वाले व्यक्ति थे। उन्होंने अफजल खान की हत्या की, लेकिन बाद में उसका मकबरा भी बनवाया, जो आज भी कायम है। गायकवाड़ और हिंदू राष्ट्रवादी शिवाजी के व्यक्तित्व के इन पहलुओं का जिक्र नहीं करते ताकि उन्हें एक मुस्लिम विरोधी राजा के रूप में पेश किया जा सके, जो वे नहीं थे। महाराष्ट्र में और अब पूरे भारत में यह प्रचार किया जा रहा है कि शिवाजी मुस्लिम विरोधी राजा थे। शिवाजी के जीवन और कार्यों का अध्ययन करने पर यह नैरेटिव पूरी तरह गलत साबित होता है। उन्हें सर्वाधिक चिंता गरीब किसानों की रहती थी जिनके संरक्षण के लिए उन्होंने बिचैलियों की ज्यादतियों को बंद करवाया, जिससे गरीब किसानों को बहुत राहत मिली।
ब्राम्हणवाद के पैरोकारों द्वारा शिवाजी महाराज को मुस्लिम विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाना सच्चाई को तोड़मरोड़कर पेश करने जैसा है। यही गायकवाड़ का लक्ष्य भी है। धीरेन्द्र शास्त्री और संघ परिवार अपने हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इस तरह की गलत बातें फैला रहे हैं जबकि शिवाजी का हिन्दवी सी आशय हिन्दू राष्ट्र कतई नहीं था।
पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि पुस्तक विक्रेताओं को गोविन्द पानसरे की पुस्तक के आर्डर बड़ी संख्या में मिल रहे हैं। साथ ही मानवाधिकार समूह पुस्तक के सामूहिक वाचन का आयोजन कर रहे हैं। यह अत्यंत स्वस्थ प्रतिक्रिया है।
(लेख का अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया द्वारा)










