ईरान ने अमेरिका को लंबी लड़ाई में घसीटा, परमाणु बम गिरा सकते हैं ट्रंप?

तेहरान/वॉशिंगटन: अमेरिका जापान पर परमाणु हथियार का इस्तेमाल कर चुका है तो दुनिया को इस भुलावे में नहीं रहना चाहिए कि वो दोबारा ऐसा नहीं करेगा। ईरान अमेरिका को युद्ध के एक ऐसे रास्ते पर घसीट चुका है जो अंतहीन है। शांति समझौते पर एमओयू साइन होने के बाद भी ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध का नया दौर शुरू हो चुका है। ट्रंप ने 8 अप्रैल को पक्के तौर पर कहा कि ‘सीजफायर खत्म हो चुका है।’ ये बढ़ते तनाव साफ बताते हैं कि युद्धविराम स्थायी शांति में नहीं बदलेगा। अमेरिका को उसकी मर्जी के खिलाफ ईरान के साथ एक लंबे युद्ध में खींचा जा रहा है।

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जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट कमर आगा ने ‘विनाशकारी युद्ध’ की आशंका जताई है। कमर आगा मध्य पूर्व की राजनीति और ईरान के शासन को काफी अच्छे से समझते हैं। उन्होंने कहा ‘अमेरिका अपने एक भी मकसद पूरा नहीं कर पाया है।

ट्रंप ने एक हफ्ते में ईरान को जीतकर सत्ता पलट देने का प्लान बनाया था लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो पाया। ईरान अड़ गया है और अगर अमेरिका यहां से पीछे हटता है तो ईरान खुद को उस शक्ति के तौर पर पेश करेगा जिसने अमेरिका-इजरायल को हरा दिया है।’

ईरान ने यह दिखा दिया है कि वह ओमानी रूट से गुजरने वाले जहाजों को रोकने के लिए असल गोलीबारी करने को भी तैयार है। उसने जहाजों पर हमले किए भी हैं और उसके बाद ही अमेरिका ने ईरान में सैन्य और आईआरजीसी के ठिकानों पर हमले शुरू किए।

युद्धविराम को बनाए रखना इसलिए मुश्किल रहा है क्योंकि अमेरिका और ईरान की ताकतें अलग-अलग तरह की हैं। दोनों में से कोई भी यह नहीं मानता कि उसने हार मान ली है। अमेरिका सैन्य रूप से बहुत मजबूत है और उसके पास जबरदस्त सैन्य क्षमता है।लेकिन उसका राजनीतिक संकल्प कमजोर है। वह इस युद्ध में बने नहीं रहना चाहता और न ही ईरान में जमीनी सेना भेजना चाहता है।

अमेरिका लंबे युद्ध में अपने सैन्य हथियारों का भंडार खत्म नहीं करना चाहता और न ही अपनी वैश्विक सैन्य कोशिशों को ईरानी सरकार के खिलाफ केंद्रित करना चाहता है। वियतनाम और अफगानिस्तान युद्ध का भूत भी अमेरिका को डरा रहा है। इन दोनों जगहों पर वर्षों तक लड़ने के बाद भी अमेरिका ‘हारा’ हुआ माना गया।

इसलिए भले ही अमेरिका के पास जबरदस्त सैन्य क्षमता है लेकिन इस बात की बहुत कम संभावना है कि वह ईरान में सरकार बदलवा पाएगा या जबरदस्ती होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवा पाएगा।

ईरानी सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसका राजनीतिक संकल्प है। वह हर हाल में बने रहने के लिए अडिग है।

चूंकि इस युद्ध की शुरुआत में ही कई अहम राजनीतिक नेता मारे गए थे इसलिए सरकार और भी ज्यादा कट्टर और सैन्य-केंद्रित हो गई है। मौजूदा सरकार विचारधारा से प्रेरित, समझदार और बेरहम है। ईरानी सरकार की अगर कुछ कमजोरी है तो वो अर्थव्यवस्था है। इस युद्ध के कारण ईरान को भारी आर्थिक और सैन्य नुकसान उठाना पड़ा है। फिर भी वो घुटने टेकने को तैयार नहीं है।

स्थिति बिगड़ने पर ईरान मिडिल ईस्ट के देशों की तेल की सप्लाई को ध्वस्त कर सकता है। और इससे दुनिया में अफरातफरी मच जाएगी। तेल और गैस ठिकानों पर अगर हमला होता है तो कई वर्ष उसे फिर से बनाने में लगेंगे। यानि वैश्विक अर्थव्यवस्था कई वर्षों तक प्रभावित रहेगी। खुद अमेरिका इसके प्रभाव से नहीं निकल पाएगा। ईरान के अंदर राष्ट्रवाद अभी चरम पर है और लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया है कि अगर देश ही नहीं रहेगा तो फिर क्या बचेगा। इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ने जब हमला किया था तो उस वक्त भी 8 वर्षों तक ईरानी लड़ते रहे। जबकि उस वक्त उनके पास सेना भी बहुत पुरानी थी।
क़मर आग़ा, जियो पॉलिटिकल एक्सपर्ट

अमेरिका, इजरायल या ईरान किसी के लिए भी पीछे हटना क्यों ‘असंभव’ है?

अमेरिका, इजरायल और ईरान में घरेलू हालात बहुत अलग हैं और यही हालात युद्धविराम होने से रोक रहे हैं। ईरान में युद्ध की वजह से वहां की सरकार और सख्त हो गई है और ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) का राजनीतिक सत्ता पर नियंत्रण और मजबूत हो गया है।स्थिति ये है कि ईरान के जो नेता बातचीत की टेबल पर होते हैं उनके पास किसी मुद्दे पर थोड़ा भी पीछे हटने का विकल्प नहीं होता। थोड़ा से भी सुलह करने की स्थिति में अगर वो आते हैं तो IRGC उन्हें गद्दार तक ठहरा सकता है। IRGC के लिए स्थिति ये है कि अगर वो थोड़ा भी झुकता है तो देश में सख्त नियंत्रण वाली इस्लामिक सरकार के अस्तित्व पर संकट पैदा हो जाएगा।

यही वजह है कि प्रतिबंधों में ढील और 300 अरब डॉलर का पुननिर्माण फंड मिलने जैसे आर्थिक फायदों के बाद भी ईरान होर्मुज स्ट्रेट से किसी भी हाल में कंट्रोल नहीं छोड़ना चाहता। IRGC के लिए आर्थिक फायदे से ज्यादा जरूरी खुद को मजबूत दिखाना है।

दूसरी तरफ इतिहास गवाह है कि 1981 में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात और 1995 में इजरायल के प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन की हत्या कर दी गई थी। ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि उन्होंने ऐसे नेताओं के साथ समझौते किए थे जिन्हें उनके अपने देश के कट्टरपंथी धड़े कट्टर दुश्मन मानते थे। ऐसे समझौते करने पर नेताओं को अपनी जान भी जोखिम में डालनी पड़ सकती है। नेतन्याहू इस बात को जानते हैं।

डोनाल्ड ट्रंप के साथ दिक्कत ये है कि युद्ध लड़ने के लिए उनके पास घरेलू समर्थन नहीं है। लेकिन ईरान के साथ समझौते के बाद MAGA (Make America Great Again) समर्थक भी उनके खिलाफ होते जा रहे हैं। ट्रंप को उम्मीद थी कि ईरान 300 अरब डॉलर के फंड और प्रतिबंधों में ढील मिलने से होर्मुज की जिद को छोड़ देगा लेकिन उन्होंने तेहरान के इरादे को कम करके आंका। इसीलिए होर्मुज में कई जहाजों पर हमले के बाद 8 जुलाई को ट्रंप ये कहने पर मजबूर हो गये कि ‘युद्धविराम खत्म हो चुका है।’

ईरान युद्ध में परमाणु हथियार के इस्तेमाल की क्यों आशंका है?

डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल का डेढ़ वर्ष खत्म हो चुका है और अगर वो ईरान युद्ध में उन्हें अगले ढाई वर्ष तक भी उलझा कर रख सकता है। तो डोनाल्ड ट्रंप मजबूर हो चुके हैं।

ईरान के पक्के इरादे का मतलब है कि उसने सिर पर कफन बांध कर रखा है। तेहरान के डिप्टी मेयर हामिदरेज़ा गुलामज़ादेह ने कहा कि अमेरिका के पास पारंपरिक लड़ाई का विकल्प खत्म हो चुका है और उसके पास बस एक विकल्प बचता है और वो है ‘परमाणु युद्ध’। यानि डोनाल्ड ट्रंप जो ‘अस्तित्व खत्म कर देने’ की धमकी दे रहे हैं ईरानी शासन उस हद तक जाने के लिए भी तैयार है।

तो यहां स्थिति ये बनती है कि या तो फिलहाल ‘जैसे को तैसा’ जवाब देने वाले जो हमले चल रहे हैं वो चलते रह सकते हैं लेकिन अगर ये स्थिति भड़कती है और अगर ईरान, इजरायल को खत्म करने के इरादे से सैकड़ों मिसाइलों के साथ हमला करता है तो फिर एक ‘विनाशकारी परमाणु युद्ध’ की स्थिति में ये युद्ध जा सकता है और इस बात की आशंका से इनकार करने के बजाए दुनिया को हर हाल में टकराव को तत्काल खत्म करने के लिए कशिशें करनी चाहिए।

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