6 साल में 36 हजार स्कूल कम हुए, विपक्ष की विधानसभा में घेरने की तैयारी

यूपी में 6 साल में 36 हजार सरकारी प्राइमरी स्कूल कम हो गए हैं। 26 हजार स्कूलों को कंपोजिट कर कक्षा- 1 से 8 तक बना दिया गया। वहीं, अब 50 से कम छात्र संख्या वाले 10,827 स्कूलों का मर्जर किया जा रहा है। प्रदेश में करीब 13 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों में उच्च प्राथमिक विद्यालय नहीं हैं।

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स्कूलों के मर्जर को लेकर 11 अगस्त से शुरू हो रहे विधानसभा में हंगामा होने की पूरी संभावना है। इसको देखते हुए सरकार मर्जर को बच्चों के हित में बताने की तैयारी कर रही है। 2016-17 में यूपी में 1 लाख 58 हजार 914 परिषदीय स्कूल थे। मार्च, 2020 में परिषदीय प्राइमरी स्कूलों में 4.18 लाख और उच्च प्राथमिक स्कूलों में 1.62 लाख शिक्षक कार्यरत थे। इनमें शिक्षामित्रों की संख्या को भी शामिल है।

2019 में सरकार ने एक ही परिसर में संचालित प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों का मर्जर कर कक्षा- 1 से 8 तक एक कंपोजिट स्कूल स्थापित करने का निर्णय लिया था। इसके बाद 24 हजार से अधिक प्राथमिक स्कूल उच्च प्राथमिक में मर्ज कर कंपोजिट विद्यालय बना दिए गए। इससे परिषदीय स्कूलों की संख्या घटकर 1 लाख 32 हजार 886 रह गई।

2025 में सरकार ने 50 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का पास में स्थित अन्य परिषदीय स्कूल में मर्ज करने का फैसला किया। सरकार के आदेश के बाद देखते ही देखते जिलों में करीब 10 हजार 827 स्कूलों को मर्ज कर दिया गया। स्कूलों के मर्जर के बाद अब परिषदीय विद्यालयों की संख्या घटकर 1 लाख 22 हजार ही रह जाएगी। इस तरह प्रदेश में बीते सात साल में करीब 36 हजार से अधिक प्राथमिक स्कूल कम हो जाएंगे।

13 हजार ग्राम पंचायतों में यूपीएस नहीं प्रदेश में 57,694 ग्राम पंचायतें हैं, जबकि उच्च प्राथमिक स्कूलों की संख्या 45,625 है। इनमें 24,391 कंपोजिट और 21,265 उच्च प्राथमिक स्कूल शामिल हैं। करीब 13 हजार ग्राम पंचायतों में उच्च प्राथमिक स्कूल नहीं हैं।

इस तरह बढ़ गया छात्र-शिक्षक औसत निशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत प्राथमिक स्कूल में छात्र-शिक्षक अनुपात 30:1 (30 छात्रों पर एक शिक्षक) है। उच्च प्राथमिक में 35:1 (35 बच्चों पर एक शिक्षक) है।

मार्च, 2019 में प्राइमरी स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात 35:1 था। लेकिन, उच्च प्राथमिक में यह मात्र 24:1 था। करीब 26 हजार से अधिक कंपोजिट स्कूल बनाने के बाद यह औसत प्राथमिक स्कूलों में 29:1 हो गया। शिक्षामित्रों की संख्या शामिल करने पर यह औसत 22:1 हो जाता है। वहीं, उच्च प्राथमिक स्कूलों में औसत 30:1 है।

कंपोजिट से बच्चे प्रभावित नहीं बेसिक शिक्षा विभाग का तर्क है कि कंपोजिट स्कूल होने से बच्चों की शिक्षा पर कोई फर्क नहीं पड़ा। पहले 2 यूनिट के रूप में स्कूल चल रहे थे। अब एक यूनिट के रूप में स्कूल संचालित हैं। वहां स्कूल खत्म नहीं हुआ है। केवल एक ही परिसर में स्थित प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय को एक कर कंपोजिट स्कूल बनाया है। बच्चे पहले भी उसी स्कूल में पढ़ रहे थे, अब भी उसी स्कूल में पढ़ रहे। अब बच्चे कक्षा- 1 से 8 तक एक ही स्कूल में पढ़ेंगे।

कंपोजिट स्कूल से यह फायदा हुआ कि दोनों स्कूलों के शिक्षकों को एक ही स्कूल में मर्ज किया गया। इससे दोनों स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर हो गई। कक्षाओं का संचालन आसानी से हो रहा। विभाग ने अपने संसाधनों और शिक्षकों का बेहतर उपयोग किया है। बच्चों को भी बेहतर शिक्षा और सुविधाएं मिल गई हैं।

कम छात्र संख्या में बच्चों को भी मुश्किल बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी बताते हैं- एक स्कूल में 10-20 बच्चे होने से हर क्लास में 4-5 बच्चे ही नामांकित रहते हैं। स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति 50-70 फीसदी रहती है। ऐसे में एक कक्षा में रोजाना 2-3 बच्चे भी नहीं होते। ऐसे माहौल में बच्चे क्या पढ़ पाएंगे? बच्चों को पढ़ने ही नहीं खेलने का माहौल भी नहीं मिल पाता। इसलिए यह सोचना पड़ा कि जिस बच्चे के लिए स्कूल खुला है, उसे अंतत: क्या मिल रहा?

75 बच्चों के मानक पर मिली सुविधाएं बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारी बताते हैं कि भारत सरकार से कोई डिमांड की जाती है, तो सरकार कहती है कि इतने कम बच्चों में कैसे सुविधाएं दें? यह कितना उपयोगी है? भारत सरकार परिषदीय स्कूलों में स्मार्ट क्लास, पुस्तकालय, आईसीटी लैब जैसी सुविधाएं 100 बच्चों के स्कूल में देती है। यूपी सरकार के विशेष आग्रह पर केंद्र ने ये सुविधाएं 75 बच्चों के स्कूल में देने की मंजूरी दी है।

एक लैब पर केंद्र सरकार का 3 से 4 लाख रुपए खर्च आता है। उसके लिए एक शिक्षक भी अलग से नियुक्त करना होता है। अधिकारी कहते हैं कि कंपोजिट स्कूल या स्कूलों की पेयरिंग वास्तव में उन बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए की जा रही है, जिनके पास शिक्षा के लिए सरकारी स्कूल के अलावा दूसरा कोई साधन नहीं है।

विधानसभा सत्र से पहले तैयारी में जुटी सरकार विधानमंडल के मानसून सत्र 11 से 16 अगस्त तक चलेगा। इस दौरान सपा और कांग्रेस की ओर से स्कूलों के मर्जर को बड़ा मुद्दा बनाया जाएगा। इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की पूरी तैयारी है। संभव है, इस मुद्दे पर विपक्ष एक दिन सदन की कार्यवाही को पूरी तरह बाधित करे। बेसिक शिक्षा विभाग ने विधान परिषद और विधानसभा में विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की तैयारी शुरू की है। विधानसभा में उठने वाले हर सवाल का जवाब तैयार कराया जा रहा है।

बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार और स्कूल शिक्षा निदेशक कंचन वर्मा ने 6 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग की इसके जरिए सभी अधिकारियों को स्कूलों के मर्जर की कार्रवाई 8 अगस्त तक पूरी करने के निर्देश दिए। जिससे 11 अगस्त से सदन शुरू होने तक स्पष्ट हो सके कि कितने स्कूल मर्जर किए गए हैं।

उधर, सूत्रों का कहना है कि सरकार ने 50 से कम छात्र संख्या वाले और एक किलोमीटर की दूरी के स्कूलों को ही मर्ज करने का फैसला भी विधानसभा के मानसून सत्र के मद्देनजर किया है। जानकार बताते हैं, सरकार सदन में बताएगी कि छात्र हित में मर्ज होने वाले स्कूलों की संख्या को घटाकर 5 हजार के अंदर ही रखा गया है। जानकार मानते हैं, मुख्यमंत्री योगी इस मुद्दे पर पहली बार सदन में अपनी बात रखेंगे।

 

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