पाकिस्तान के परमाणु बम से क्या मिडिल ईस्ट में राज करेगा सऊदी अरब?

नई दिल्ली। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए समझौते को भारत की सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में देखा जा रहा है। इसके इतर इस समझौते को मिडिल ईस्ट में इजरायल के परमाणु हथियारों के जवाब में भी देखा जा रहा है। समझौते में कहा गया है कि किसी भी देश के खिलाफ आक्रमण दोनों देशों के खिलाफ आक्रमण माना जाएगा।

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एक्सपर्ट्स की मानें तो पाकिस्तान के साथ समझौता करके सऊदी अरब ने खुद का उस परमाणु छतरी के भीतर शामिल कर लिया है, जो अब तक मिडिल ईस्ट में सिर्फ इजरायल के पास है। चूंकि, पाकिस्तान इकलौता परमाणु संपन्न इस्लामिक देश है, जिसके पास इजरायल तक मार करने वाली मिसाइले हैं।

सऊदी अरब को परमाणु संपन्न ताकत के साथ जोड़ा

पाकिस्तान के साथ इस समझौते ने सऊदी अरब को प्रभावी रूप से पाकिस्तान की परमाणु सशस्त्र सेना का साथ जोड़ दिया है। हालांकि इस समझौते की बहुत कम जानकारियां सामने आईं हैं लेकिन रियाद ने संकेत दिए हैं कि इस समझौते के तहत उसे वास्तविक सुरक्षा कवच हासिल होगा। वहीं एक्सपर्ट का कहना है कि इजरायल इस पर पैनी नजर रखेगा।

समझौते का इस्तेमाल आक्रामकता के लिए नहीं- आसिफ

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने रॉयटर्स को बताया कि परमाणु हथियार इस समझौते के रडार पर नहीं हैं। उन्होंने कहा कि इस समझौते को अन्य खाड़ी देशों तक भी बढ़ाया जा सकता है।

आसिफ ने कहा, “हमारा इस समझौते का इस्तेमाल किसी भी तरह की आक्रामकता के लिए करने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन अगर दोनों पक्षों को खतरा होता है, तो जाहिर है कि यह व्यवस्था लागू हो जाएगी।”

रक्षात्मक समझौते में सभी सैन्य साधन शामिल- सऊदी

खाड़ी अरब देशों ने कहा कि इजराइल ने पिछले हफ्ते कतर पर हमलों के बाद खुद को एक सीधा खतरा साबित कर चुका है। सऊदी अरब ने यह भी कहा है कि अगर प्रतिद्वंद्वी ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है, तो वह भी ऐसा ही करेगा।

यह पूछे जाने पर कि क्या पाकिस्तान अब सऊदी अरब को परमाणु छत्र प्रदान करने के लिए बाध्य होगा, एक वरिष्ठ सऊदी अधिकारी ने रॉयटर्स को बताया: “यह एक व्यापक रक्षात्मक समझौता है जिसमें सभी सैन्य साधन शामिल हैं।”

समझौता अमेरिका की सुरक्षा में घटते विश्वास का प्रतीक

विश्लेषकों ने कहा कि यह समझौता क्षेत्र को संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रदान की जाने वाली सुरक्षा में घटते विश्वास को भी दर्शाता है।

सऊदी अरब के एक बयान में कहा गया है कि इस समझौते का उद्देश्य “दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग के पहलुओं को विकसित करना और संयुक्त निरोधात्मक क्षमता को मजबूत करना है”।

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