तेहरान/नई दिल्ली: ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों की वजह से युद्ध के पहले चार दिनों में अमेरिका को करीब 2 अरब डॉलर के सैन्य सामानों का नुकसान हुआ है। इनमें SATCOM टर्मिनल, तीन F-15E स्ट्राइक ईगल और रडार शामिल हैं। ईरानी ड्रोन ने कतर के अल उदीद एयर बेस पर अमेरिकी AN/FPS-132 अर्ली वॉर्निंग रडार सिस्टम को तबाह कर दिया। जिसकी कीमत 1.1 अरब डॉलर है। कतर ने अमेरिकी रडार के तबाह होने की पुष्टि की है। इसके अलावा ईरान ने बहरीन के मनामा में अमेरिकी नौसना के फिफ्थ फ्लीट हेडक्वार्टर पर भी हमला किया था जिसमें दो सैटेलाइट कम्युनिकेशन टर्मिनल और कई बड़ी बिल्डिंगें तबाह हो गईं।
ईरान के मिसाइल हमलों ने जॉर्डन के मुवफ्फाक साल्टी एयर बेस पर एक THAAD एयर डिफेंस सिस्टम के AN/TPY-2 रडार सिस्टम को भी नष्ट कर दिया है। यूनाइटेड अरब अमीरात के अल-रुवाइस इंडस्ट्रियल सिटी में तैनात THAAD एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल (ABM) सिस्टम का AN/TPY-2 रडार कंपोनेंट को भी भारी नुकसान पहुंचा है। इसकी कीमत 300 मिलियन डॉलर के करीब है। ईरान ने AN/TPY-2 रडार सिस्टम को निशाना बनाने के लिए प्रिसिजन-गाइडेड मिसाइलों और वन-वे अटैक ड्रोन के कॉम्बिनेशन का इस्तेमाल किया था।
ईरान के सामने कैसे नाकाम हो गये अमेरिकी एयर डिफेंस
यूरेशियन टाइम्स में लिखते हुए पूर्व एयर मार्शल अनिल चोपड़ा ने लिखा है कि 2022 के यूक्रेन युद्ध के शुरुआती दिनों में रूसी वायुसेना के खिलाफ यूक्रेन का एयर डिफेंस सिस्टम काफी कामयाब रहा था और यही वजह थी की रूस तेजी से बढ़त बनाने में नाकाम रहा था। बेहतर संख्या और टेक्नोलॉजी होने के बावजूद रूस यूक्रेन के ग्राउंड-बेस्ड एयर डिफेंस सिस्टम (GBADS) को नष्ट करने में नाकाम रहा था।
जबकि जब इस साल जनवरी महीने में अमेरिका ने वेनेजुएला में जब हमला किया था तो उसने रूसी एस-300 एयर डिफेंस और चीनी रडार को सेकंड्स में खत्म कर दिए थे। अमेरिका के 150 से ज्यादा एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट्स और EA-18G ग्रोलर्स विमान बहुत आरान से वेनेजुएला के आसमान में अपने मिशन को अंजाम दे रहे थे।
लेकिन मई 2025 के संघर्ष के दौरान एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम भारत के लिए ढाल बन गया था। पाकिस्तान ने चीनी सैटेलाइट्स से एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम का पता भी लगा लिया था फिर भी पाकिस्तान की मिसाइलें और ड्रोन एस-400 के करीब भी आने से नाकाम रहे थे। एयर मार्शल अनिल चोपड़ा के मुताबिक भारतीय क्रू मेंबर्स S-400 एयर डिफेंस सिस्टम को तेजी से एक जगह से दूसरे जगह ले जाने में कामयाब रहे थे।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत का SEAD क्या था?
SEAD मतलब ‘सप्रेशन ऑफ एनिमी एयर डिफेंस सिस्टम’ होता है। इसके तहत जमीन पर मौजूद दुश्मन के रडार, एयर डिफेंस सिस्टम को खत्म करना होता है। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी रडार और मिसाइल साइट्स को बेअसर करने के लिए SEAD को अंजाम दिया था। एयर मार्शल अनिल चोपड़ा के मुताबिक दुश्मन के रडार को निष्क्रिय करने के लिए एंटी-रेडिएशन मिसाइलों का इस्तेमाल और नेत्रा AEW&C सिस्टम के साथ राफेल और Su-30MKI जैसे एडवांस्ड फाइटर जेट्स की तैनाती की कई थी।
भारत ने हवाई बढ़त हासिल करने के लिए लाहौर और आस-पास के इलाकों में रडार सहित पाकिस्तानी एयर डिफेंस सिस्टम को निशाना बनाया था। भारतीय वायुसेना ने SCALP क्रूज मिसाइल, ब्रह्मोस और क्रिस्टल मेज़ मिसाइल सहित सटीक-गाइडेड हथियारों का मिक्स इस्तेमाल किया था।
भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के रडार सिग्नल को जाम करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का इस्तेमाल किया गया, जिससे पाकिस्तानी SAMs (सरफेस टू एयर मिसाइल) अंधे हो गए। SEAD मिशन के दौरान रूसी S-400 और स्वदेशी आकाश मिसाइल जैसे सिस्टम को मिलाकर भारतीय वायुसेना ने एक लेयर्ड एयर डिफेंस बनाया गया था और फिर राफेल लड़ाकू विमानों ने एक सुरक्षा कवच का निर्माण कर दिया था।
THAAD एयर डिफेंस सिस्टम की नाकामी की वजह क्या है?
एयर मार्शल अनिल चोपड़ा के मुताबिक THAAD रडार और बैटरी साइट्स को बचाने के लिए इस्तेमाल होने वाले आम सिस्टम में MIM-104 पैट्रियट (PAC-3 मिसाइल) शामिल है, जो प्राइमरी, क्लोज-इन, लोअर-टियर डिफेंस है जो THAAD बैटरी, खासकर AN/TPY-2 रडार को क्रूज मिसाइल, एयरक्राफ्ट और टैक्टिकल बैलिस्टिक मिसाइल से बचाता है। आयरन डोम सबसे निचले टियर के तौर पर काम करता है जो कम दूरी के रॉकेट, आर्टिलरी और ड्रोन को रोकता है जो THAAD रडार इंस्टॉलेशन के लिए खतरा बन सकते हैं।
इसके अलावा डेविड्स स्लिंग एक मिड-टियर सिस्टम है जिसे THAAD और आयरन डोम के साथ मिलकर इस्तेमाल किया जाता है। यह क्रूज मिसाइलों और कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर सकता है। ड्रोन और नीचे उड़ने वाले खतरों से THAAD रडार के आस-पास के इलाके को बचाने के लिए कई शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस (SHORAD) सिस्टम लगाए गए हैं।
अनिल चोपड़ा ने बताया है कि THAAD एयर डिफेंस सिस्टम को बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए बनाया गया है। जिससे ये अलग अलग दिशाओं से और अलग अलग एंगल से होने वाले हमलों, खासक जो कम ऊंचाई से हो रहे हों, या फिर क्रूज मिसाइलों के हमलों के सामने कमजोर हो जाता है।
‘प्याज के छिलके’ वाली स्ट्रैटजी की क्यों है जरूरत?
अनिल चोपड़ा के मुताबिक S-400, पैट्रियटया NASAMS जैसे एयर डिफेंस सिस्टम को हार्ड-किल हथियारों (घूमने वाले हथियार, एंटी-रेडिएशन मिसाइल, ड्रोन और गाइडेड बम) से बचाने के लिए एक लेयर्ड, “प्याज के छिलके” वाले डिफेंसिव बबल बनाने की जरूरत होती है। जिसमें एक्टिव इंटरसेप्शन, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और पैसिव सर्वाइवेबिलिटी टैक्टिक्स शामिल हों। खासकर सुसाइड ड्रोन एयर डिफेंस सिस्टम के लिए काफी खतरनाक बन चुके हैं। ऐसे में लेयर्ड डिफेंस सिस्टम ये तय करता है कि अगर एक सिस्टम अगर फेल हो रहा है तो दूसरा सिस्टम उसे रोके। भारत ने यही किया था।
ईरान ने THAAD रडार को टारगेट करने के लिए क्रूज मिसाइल और शाहिद-136 क्लास के कामिकेज ड्रोन का इस्तेमाल किया है। जबकि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ तुर्की के बायरकतार टीबी-2 ड्रोन और चीनी ड्रोनों का इस्तेमाल किया था। ईरानी ड्रोन ने अमेरिकी एयर डिफेंस को भेद दिया है जबकि तुर्की और चीन के ड्रोन भारत के लेयर्ड एयर डिफेंस को भेदने में नाकाम हो गये थे।










