ईरान ने बताईं युद्धव‍िराम की नामुमकिन शर्तें, मानेगा अमेरिका?

तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने को लेकर बातचीत हो सकती है। लेकिन शांति वार्ता से पहले जो शर्तें रखी गई हैं उन्हें देखने से यही पता चलता है कि शायद इन शर्तों को मानना अमेरिका के लिए नामुमकिन होगा। अमेरिकी शर्तें भी ऐसी ही हैं जो शायद ही तेहरान को कबूल हो। इसीलिए डोनाल्ड ट्रंप जो युद्ध से हर हाल में भागना चाह रहे हैं क्या वो तेहरान की इन शर्तों को मानेंगे ये बड़ा सवाल है। अमेरिका के उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस शांति वार्ता पर बात करने पाकिस्तान जा रहे हैं और उससे पहले ईरान ने अपनी शर्तें बता दी हैं।

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डोनाल्ड ट्रंप ने पहले कहा था कि ईरान के साथ ‘अच्छी बातचीत’ चल रही है। हालांकि पहले तेहरान ने उनके दावों का मजाक उड़ाया था लेकिन बाद में उसने स्वीकार किया है कि उसे ‘कुछ मित्र देशों’ से संदेश मिले हैं जिनमें ‘युद्ध को समाप्त करने के लिए बातचीत की अमेरिकी गुजारिश’ का जिक्र है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक जिसमें सूत्रों का हवाला दिया गया है, ईरान के रुख का मूल संदेश यह है कि सिर्फ युद्ध खत्म करना ही काफी नहीं होगा। यदि बातचीत आगे बढ़ती है तो उसकी मुख्य मांगों में कई मांगे ऐसी हैं जिसपर शायद ही सहमति बन सकती है।

ईरान ने युद्धविराम के लिए अमेरिका के सामने प्रमुख मांगे क्या रखी हैं?

  • अमेरिकी सेना की वापसी- ईरान ने मांग की है कि फारसी खाड़ी और पश्चिम एशिया में सभी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद किया जाए।
  • होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण- ईरान ने मांग रखी है कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले सभी व्यापारिक जहाजों से शुल्क वसूलने का अधिकार उसे मिले। ठीक वैसे ही जैसे स्वेज नहर में होता है।
  • आर्थिक मुआवजा- युद्ध के दौरान अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान को जो भी नुकसान हुआ है उसकी भरपाई अमेरिका और इजरायल करे।
  • प्रतिबंध खत्म हों- ईरान ने मांग की है कि उसके ऊपर लगाए गये सभी प्रतिबंध हटाए जाएं।
  • सुरक्षा की गारंटी- भविष्य में ईरान के खिलाफ कोई भी युद्ध थोपा नहीं जाए।
  • मिसाइल पर नियम नहीं- ईरान ने कहा है कि वो बगैर किसी बातचीत के अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों का निर्माण जारी रखेगा और ईरानी मिसाइलों के लिए कोई रेंज नहीं होगी।
  • हिज्बुल्लाह की रक्षा- ईरान ने मांग की है कि लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ होने वाले इजरायली हमलों को रोका जाए।

ईरान की इन मांगों को मानना अमेरिका और इजरायल के लिए मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन की तरह है। जैसे आर्थिक मुआवजे को ही मान लें। हालांकि ईरान ने आधिकारिक तौर पर अभी तक कोई आंकड़ा नहीं रखा है लेकिन विभिन्न रिपोर्ट्स में कहा गया है कि मुआवजे की ये राशि 500 अरब डॉलर से ज्यादा हो सकती है। इतना ज्यादा मुआवजा कौन देगा? इसके अलावा बैलिस्टिक मिसाइस की रेंज।

ईरान के खिलाफ युद्ध शुरू करने के पीछे डोनाल्ड ट्रंप ने जिन कुछ वजहों के बारे में बताया था उनमें से एक उसकी बैलिस्टिक मिसाइल का खतरा भी था। यानि जिस वजह से अमेरिका ने युद्ध शुरू किया क्या उस वजह को ही युद्धविराम की शर्तों से हटाकर वो युद्ध खत्म करेगा?

ईरान की शर्तें मानना अमेरिका के लिए असंभव की तरह क्यों है?

  • सैन्य वापसी- ईरान की शर्त है कि अमेरिका मध्य पूर्व से अपने सभी सैन्य बेस हटा ले। अमेरिका के लिए ऐसा करना इस क्षेत्र में अपने प्रभाव को पूरी तरह खत्म करने और सऊदी अरब जैसे सहयोगियों को असुरक्षित छोड़ने जैसा होगा। अमेरिका किसी भी हाल में इस शर्त को नहीं मानेगा।
  • होर्मुज स्ट्रेट पर टैक्स- दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल का व्यापार इसी रास्ते से होता है। अगर ईरान यहां टैक्स वसूलने लगा तो वैश्विक तेल की कीमतें पूरी तरह ईरान के नियंत्रण में आ जाएंगी और इसे अमेरिका और पश्चिमी देश कभी स्वीकार नहीं करेंगे।
  • प्रॉक्सी संगठन- इजरायल हिज्बुल्लाह जैसे ईरान के प्रॉक्सी संगठनों का खात्मा चाहता है और ईरान की शर्त में हिज्बुल्लाह को बचाना शामिल है। ये शर्त भी अमेरिका-इजरायल को मंजूर नहीं होगा।
  • मिसाइल प्रोग्राम- अमेरिका और इजरायल अब ईरानी मिसाइलों की क्षमता को बहुत अच्छी तरह से जान चुके हैं। ईरान के लिए इस पर समझौता करना आत्मसमर्पण जैसा होगा। अमेरिका ईरान को उसकी बैलिस्टिक मिसाइलों को लेकर ‘आजादी’ नहीं दे सकता।
  • परमाणु क्षमता- सबसे बड़ा सवाल ईरान के परमाणु बम को लेकर है। क्या ईरान अपने परमाणु सपने को खत्म होने देगा। इजरायल किसी भी ऐसी संधि का विरोध कर रहा है जिसमें ईरान को यूरेनियम संवर्धन की थोड़ी भी छूट मिले। अमेरिका के लिए इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करना लगभग असंभव है।
  • अमेरिका के उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस इस वार्ता में शामिल होने के लिए पाकिस्तान जा रहे हैं। ईरान के अधिकारी भी इस्लामाबाद पहुंचने वाले हैं। लेकिन युद्धविराम की शर्तें ऐसी हैं जिनपर सहमति बनना अत्यंत मुश्किल या नामुमकिन की तरह है। ऐसा लग रहा है कि ईरान ने जो शर्तें रखी हैं वो युद्ध से भागने की कोशिश करने वाले डोनाल्ड ट्रंप का पैर बांधने जैसा है। भारत के जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट सुशांत शरीन भी इसी बात को उठा रहे हैं।
  • उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा है कि अमेरिकी 3 बुनियादी मुद्दों पर समझौता करने के लिए तैयार हैं। 1- ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को छोड़ दे और एनरिच्ड यूरेनियम सौंप दे। 2- ईरान अपने मिसाइल कार्यक्रम को सीमित करने पर सहमत हो और 3- ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को खोल दे। लेकिन सच तो यह है कि ईरान पहले से ही अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम को खत्म करने के लिए बातचीत कर रहा था और उम्मीदों से कहीं ज्यादा आगे बढ़ रहा था।  युद्ध शुरू होने से पहले होर्मुज जलडमरूमध्य पहले से ही खुला हुआ था। मिसाइल कार्यक्रम एक मुद्दा था लेकिन ईरान अपनी रक्षा के लिए अपनी सबसे शक्तिशाली गैर-परमाणु क्षमता को छोड़ने पर क्यों सहमत होगा? तो फिर ट्रंप को ऐसा क्या मिला जो युद्ध शुरू करते समय उनके पास पहले से नहीं था?
    सुशांत शरीन, जियो-पॉलिटिकल एक्सपर्ट

    कुल मिलाकर पाकिस्तान में अगर शांति वार्ता का पहला चरण होता है तो उसके कामयाब होने की संभावना बहुत ही कम है। ईरान अड़ा हुआ है और अब उसे अपनी बैलिस्टिक मिसाइल की क्षमता पर और ज्यादा यकीन हो चुका है। वो भला अब हार क्यों माने जब उसके पास हारने के लिए कुछ खास नहीं है। अब अमेरिका और इजरायल को तय करना है कि वो किन शर्तों पर युद्ध से बाहर निकलता है।

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