कोलाकात। जो कभी रात के अंधेरे में मुंह छिपाकर भारत में घुस आए थे, वो अब दिन के उजाले में खुद अपना चेहरा दिखाकर बांग्लादेश पलायन कर रहे हैं। जिन्होंने कभी गलत तरीके से भारतीय पहचान पत्र बनवाकर खुद को इस देश का नागरिक साबित करने की कोशिश की व विभिन्न सरकारी योजनाओं का वर्षों लाभ उठाया, वे अब खुलकर सामने आ रहे हैं और अपनी असल पहचान बता रहे हैं।
सीमा पर पहुंचकर अपने पास छिपाकर रखे बांग्लादेश के दस्तावेज दिखा रहे हैं और बीएसएफ के जवानों व पुलिसकर्मियों से सुरक्षित सीमा पार करवा देने की मिन्नतें कर रहे हैं। कोलकाता से करीब 90 किलोमीटर दूर उत्तर 24 परगना जिले में भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित हकीमपुर सीमा चौकी पर इन दिनों ऐसा ही नजारा है।
वहां सैकड़ों बांग्लादेशी घुसपैठियों का जमावड़ा लगा है। बंगाल के विभिन्न जिलों व अन्य राज्यों से पोटली-गठरी लिए घुसपैठिये ट्रेन-बसों से यहां पहुंच रहे हैं। इनमें पुरूष-महिलाएं, बच्चों से लेकर बुजुर्ग सभी शामिल हैं। उनके चेहरों पर डर व घबराहट साफ झलक रही है।
बांग्लादेश के खुलना जिले के रहने वाले हारून शेख ने बताया-‘2020 में लाकडाउन के समय एजेंट की मदद से परिवार लेकर चोरी-छिपे यहां आया था और तब से कोलकाता से सटे बिराटी इलाके के देवीनगर में रह रहा था। एजेंट ने रात के अंधेरे में मुझे, मेरी बीवी, चार बेटों व एक बेटी को सीमा पार करवा दिया था। इसकी एवज में ₹4,000 रुपये लिए थे। मैं अपने बेटों के साथ राजमिस्त्री का काम कर रहा था।
बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) की प्रक्रया के दौरान हमारी पहचान सामने आ गई थी। अब यहां नई सरकार बनने के बाद हमारे पास वतन लौटने के सिवाय कोई उपाय नहीं है। बांग्लादेश लौटकर धान की खेती करूंगा।’ हारून ने सरकार का शुक्रिया अदा करते हुए कहा-‘उसकी मेहरबानी है कि हमें बिना गिरफ्तार किए सही सलामत घर भेजने की व्यवस्था की जा रही है, वरना हम जेल में सड़ रहे होते।’

मोहम्मद सोहेल गाजी भी तीन साल पहले अपनी मां, पत्नी व छोटे भाई के साथ चोरी-छिपे सीमा पार करके भारत में घुसे थे और बशीरहाट के कालेज मोड़ इलाके में किराए के मकान में रह रहे थे। सीमा पार कराने के लिए उन्होंने एक एजेंट को ₹15,000 रुपये दिए थे। दोनों भाई निर्माण क्षेत्र में काम कर रहे थे। गाजी ने बताया-‘बंगाल में भाजपा की सरकार बनने के बाद अहसास हो गया था कि यहां इस तरीके से रह पाना अब मुमकिन नहीं है।
खबरों में देखा कि हमारे जैसे बहुत से लोग हकीमपुर सीमा चौकी से बांग्लादेश लौट रहे हैं इसलिए यहां चला आया। हम अपने साथ बांग्लादेश से कोई पहचान पत्र लेकर नहीं आए थे, इसलिए लौटने में परेशानी हो रही है क्योंकि वापस जाने के लिए वहां का नागरिक होने का कोई दस्तावेज सरकार के पास पेश करना होगा।’

बांग्लादेश के साथ सातखीरा जिले के रामकृष्णपुर गांव की रहने वाली रोजाना बीबी भी एजेंट को रुपये देकर भारत में घुसी थी और कोलकाता के मटियाबुर्ज इलाके के एक घर में सहायिका का काम कर रही थी। उसका 18 साल का एक बेटा है। मकान मालकिन ने पहचान सामने आने के बाद उसे काम से निकाल दिया है। अब वह किसी तरह बांग्लादेश लौट जाना चाहती है।
घुसपैठियों को वापस भेजने को अपनाई जा रही विशेष पद्धति
हकीमपुर सीमा चौकी पर बंगाल पुलिस की ओर से एक कैंप खोला गया है। वहां तैनात एक अधिकारी ने बताया-‘जो बांग्लादेशी घुसपैठिये यहां पहुंच रहे हैं, उनकी तस्वीर खींची जा रही है और उन्हें बांग्लादेश के पहचान पत्र दिखाने को कहा जा रहा है। जो दस्तावेज दिखाकर साबित कर पा रहे हैं कि वे बांग्लादेशी नागरिक हैं, उन्हीं को सीमा पार लौटाने की व्यवस्था की जा रही है। उन लोगों का डाटा संग्रह करने के बाद उसे ‘फारेनर आइडेंटिटी पोर्टल’ में डाला जा रहा है।

इसके बाद पद्धतिगत तरीके से डिपोर्ट किया जा रहा है। तब तक इन लोगों को होल्डिंग सेंटरों में रखा जा रहा है। अब तक 300 से अधिक घुसपैठियों को बांग्लादेश भेजा जा चुका है। जो दस्तावेज नहीं दिखा पा रहे, उन्हें बांग्लादेश में रहने वाले अपने सगे-संबंधियों से फोन पर संपर्क कर वहां से प्रशासन से पुष्टि दस्तावेज बनवाकर भेजने को कहा जा रहा है।’

सीमा चौकी पर तैनात एक बीएसएफ अधिकारी ने बताया-‘ नागरिकता प्रमाणन की सारी प्रक्रिया राज्य प्रशासन देख रहा है। हमें जब जैसा आर्डर मिल रहा है, हम उसी तरह से काम कर रहे हैं। बहुतों ऐसे हैं, जो राज्य प्रशासन की इस सुव्यवस्था का लाभ उठाने के बजाय खुद से बांग्लादेश भागने का प्रयास कर रहे हैं इसलिए सीमा पर कड़ी नजर रखी जा रही है।’













