27 दिसंबर 1797 को आगरा में जन्मे मिर्जा गालिब उन लोगों में से थे। जिन्होंने पहले अपनी आंखों के सामने मुगल सम्राज्य का पतन देखा। फिर ब्रिटिश शासन का उदय के दौर में भी वो जीवीत रहे। बताया जाता है कि 1797 से 1869 के बीच उनकी आर्थिक स्थिति 1857 के विद्रोह के बाद खराब हुई थी। मगर क्या आपको पता है कि गालिब ने सिर्फ 11 साल की छोटी-सी उम्र में शेर लिखना शुरू कर दिया था।
वे मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के दरबारी कवि भी रहे। मगर सत्ता का सिंहासन बदलते ही उन्हें जीवन में ढेरों संघर्ष करने पड़े। इतिहास के पन्नों को पलटने पर पता लगता है कि गालिब की कहानी संघर्ष की है, अकेलेपन की है, कर्ज की है, असफलताओं की और उस अद्भत साहित्यिक (Literary) टैलेंट की है। जिसे आज भी लोग नहीं भूला सकें है। गालिब के शेरों में क्या छिपा है, वो उसे पढ़ने और उसकी गहराई समझने पर ही पता लगता है।
1. अच्छा इंसान बनना, सबसे कठिन है…
गालिब की शायरियां मोटिवेशन से ज्यादा जीवन की सीख भी सिखाती है। उनका शेर है कि ‘बस कि दुश्वार है हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसां होना।’ यह शेर हमें सिखाता है कि ‘हर काम आसान नहीं होता, और अच्छा इंसान बनना तो सबसे कठिन कामों में एक है।’
2. दिल पत्थर नहीं है…
गालिब की ये लाइन आपको आशिकी से जुड़ी लग सकती है कि ‘दिल ही तो है न संग-ओ-खिश्त, दर्द से भर न आए क्यों?’ मगर इसमें वो कहना चाह रहे हैं कि दिल पत्थर नहीं है, दुख मिलने पर उसका टूटना लाजमी है।
3. संघर्ष इंसान को मजबूत बनाता है!
मिर्जा गालिब कहते हैं कि ‘रंज से खूगर हुआ इंसान तो मिट जाता है रंज, मुश्किलें मुझ पर पड़ीं इतनी कि आसां हो गईं।’ इन पंक्तियों से गालिब कहना चाह रहे हैं कि लगातार संघर्ष इंसान को इतना मजबूत बना देता है कि उसे मुश्किलें आसान लगने लगती हैं।
4. कुछ फीलिंग्स हमारे कंट्रोल से बाहर है!
‘इश्क़ पर जोर नहीं, है ये वो आतिश गालिब, कि लगाए न लगे और बुझाए न बने।’ गालिब का जिक्र हो और इश्क से जुड़ी कोई बात न आए, ऐसा कैसे हो सकता। अपनी इन पंक्तियों के जरिए वह कहना चाहते हैं कि ‘कुछ भावनाएं हमारे नियंत्रण से बाहर होती है और इश्क भी उनमें एक होता है।’
5. इच्छाओं का क्या है?
गालिब का शेर है कि ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।’ ऐसे कहने के पीछे गालिब का मतलब ये है कि ‘इंसान की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं, एक पूरी होती है तो दूसरी पैदा हो जाती है।’
6. जीवन और संघर्ष साथ-साथ चलते है!
मिर्जा गालिब की शेर है कि ‘कैद-ए-हयात और बंद-ए-गम, अस्ल में दोनों एक हैं।’ वो उर्दू और फारसी के बड़े शायर थे। लेकिन इतने भारी शब्दों का अर्थ समझने से अच्छा आप ये समझे कि ‘जीवन और संघर्ष अक्सर साथ-साथ चलते हैं।’ वो यही कहना चाह रहे हैं।
7. जीवन का दूसरा पहलू
गालिब अर्ज करते हैं कि ‘हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया, पर याद आता है, वो हर इक बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता।’ अपनी इन पंक्तियों के जरिए गालिब हमें हर स्थिति के दूसरे पहलू पर सोचने की अपनी आदत से रुबरू करवा रहे हैं।
8. न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता!
इस शेर को आप पूरा पढ़ेंगे तो समझेंगे कि गालिब ने कितनी गहरी बात कही थी। इसका मतलब था कि ‘मेरा होना ही मेरी उलझनों की वजह बन गया, अगर मैं न होता तो ये दुख भी न होते।’ ये शेर थोड़ा दार्शनिक है। लेकिन इससे अगर हम कुछ सीख सकते हैं, तो वो यह है कि जीवन है, तो उलझन, संघर्ष तो इसका हिस्सा रहेगा ही।
9. छोटी शुरुआत का मतलब?
गालिब का शेर है कि ‘कतरा अपना भी हकीकत में है दरिया लेकिन, हमको तकलीद-ए-तनुकजर्फी-ए-मंसूर नहीं।’ यानि छोटी शुरुआत का मतलब छोटी क्षमता नहीं होता।
10. छोटी-मोटी बातों को…
गालिब अर्ज करते हैं कि ‘बाजीचा-ए-अत्फाल है दुनिया मेरे आगे, होता है शब-ओ-रोज तमाशा मेरे आगे। इस शेर को आप इस तरह समझना है कि हमें की दुनिया की छोटी-मोटी बातों को दिल पर नहीं लेना है और खुश रहना सीखना है।












