वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ लड़ाई का एक अहम मकसद उसको परमाणु हथियार बनाने से रोकना कहा है। एक तरफ ट्रंप ईरान को किसी कीमत पर न्यूक्लियर वेपन हासिल ना करने देने की कसमें खा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर उनकी नीतियां दक्षिण कोरिया को परमाणु हथियार बनाने की ओर धकेल सकती हैं, जो अमेरिका का करीबी सहयोगी और परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की संधि (NPT) का हस्ताक्षरकर्ता है। ऐसा इसलिए क्योंकि दक्षिण कोरिया से अमेरिकी की दूरी उसमें असुरक्षा बढ़ाएगी और उसे परमाणु हथियार हासिल करने की ओर ले जाएगी।
यूरेशियन टाइम्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप ने पेंटागन को दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास को कम करने का आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि सियोल को अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी के लिए वाशिंगटन को सालाना 10 अरब अमेरिकी डॉलर देना चाहिए। ट्रंप का गुस्सा दक्षिण कोरिया के ईरान खिलाफ लड़ाई में साथ ना देने से है। हालांकि उनको समझना चाहिए कि यह नीति दक्षिण कोरिया को परमाणु हथियार संपन्न देश बना सकती है।
दक्षिण कोरिया का परमाणु कार्यक्रम
दक्षिण कोरिया ने करीब आधी सदी पहले 1970 के दशक में गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम चलाया था। पिछले सात दशकों में दक्षिण कोरिया के परमाणु हथियारों के साथ जटिल संबंध रहे हैं। एक समय ऐसा था जब उत्तर कोरिया के पास कोई परमाणु हथियार नहीं थे, तब सियोल में 900 से ज्यादा अमेरिकी परमाणु हथियार तैनात थे।
SIPRI के आंकड़ों के अनुसार सियोल के ‘दुश्मन’ उत्तर कोरिया के पास 60 परमाणु हथियार हैं और उसने रूस के साथ आपसी रक्षा संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। वहीं दक्षिण कोरिया के पास एक भी परमाणु हथियार नहीं है। ऐसे में ट्रंप का आंखें दिखाना और उत्तर कोरिया के साथ समझौता करने की उनकी धमकियां दक्षिण कोरिया के सामने अपना खुद का परमाणु कार्यक्रम शुरू करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं छोड़ती हैं।
दक्षिण कोरिया और परमाणु हथियार
शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने 1958 से 1991 तक दक्षिण कोरिया में परमाणु हथियार तैनात किए थे। 1953 में कोरियाई युद्ध एक युद्धविराम के साथ समाप्त हुआ, जिससे प्रायद्वीप विभाजित हो गया और बहुत अनिश्चितता पैदा हो गई। उस समय उत्तर कोरिया के पास अपने कोई परमाणु हथियार नहीं थे। हालांकि उसे सोवियत संघ और चीन का भी समर्थन था।
इस माहौल में वॉशिंगटन ने एशिया में बहुत बड़ी पारंपरिक सेना तैनात किए बिना उत्तर कोरिया से होने वाले किसी और हमले को रोकने का तरीका ढूंढा। वॉशिंगटन इस नतीजे पर पहुंचा कि इसका एकमात्र संभव समाधान दक्षिण कोरिया में परमाणु हथियार औ 60,000 अमेरिकी सैनिकों को तैनात करना था। 1958 तक दक्षिण कोरिया में पहले परमाणु हथियार पहुंच गए थे।
अमेरिका पर अविश्वास
जुलाई, 1970 में अमेरिकी अधिकारियों ने दक्षिण कोरियाई सरकार को कहा कि वहां अमेरिकी सेना की संख्या कम की जाएगी। 1970 के दशक की शुरुआत में वॉशिंगटन ने ताइवान से अपनी सेना हटा ली और ताइपे के साथ अपने संबंधों का स्तर कम कर दिया। इससे दक्षिण कोरिया का अमेरिकी सुरक्षा पर विश्वास कम हुआ और देश में असुरक्षा की भावना और बढ़ गई।
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति पार्क चुंग-ही ने सैन्य आत्मनिर्भरता और सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण का एक कार्यक्रम शुरू किया। युलगोक नाम की इस योजना का मकसद इजरायल की राष्ट्रीय रक्षा प्रणाली की तर्ज पर आधुनिक रक्षा हथियार आयात करना था। दक्षिण कोरिया ने 1971 में एजेंसी फॉर डिफेंस डेवलपमेंट और वेपन्स एक्सप्लॉइटेशन कमिटी बनाई, जिनकी देखरेख में दक्षिण कोरियाई सेना गुप्त रूप से परमाणु हथियार बना सकती थी।
अमेरिका ने रुकवाया प्रोग्राम
दक्षिण कोरिया ने 1975 में सियोल ने फ्रांस से प्लूटोनियम रीप्रोसेसिंग प्लांट और कनाडा से हैवी-वॉटर रिएक्टर खरीदने का कॉन्ट्रैक्ट किया। हालांकि जब अमेरिका को दक्षिण कोरिया के गुप्त परमाणु कार्यक्रम के बारे में पता चला तो वॉशिंगटन ने सियोल पर दबाव डाला कि वह तुरंत अपना परमाणु कार्यक्रम रोक दे।
अमेरिका ने दक्षिण कोरिया से अपने सैनिकों की वापसी को और पांच साल के लिए टालने का वादा किया ताकि सियोल अपनी सेना को आधुनिक बना सके। वॉशिंगटन ने दक्षिण कोरिया में तैनात अपने परमाणु हथियार हटाने की धमकी दी। साथ ही अमेरिकी विदेश विभाग ने फ्रांस और कनाडा पर भी दबाव डाला कि वे सियोल के साथ अपने परमाणु रिएक्टर कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दें।
छुपकर परमाणु बनाने की कोशिश
दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति पार्क ने 1975 में परमाणु हथियार कार्यक्रम को खत्म करने का आदेश दिया। हालांकि कई विश्लेषकों का कहना है कि दक्षिण कोरिया ने 1975 में अपना परमाणु कार्यक्रम खत्म नहीं किया। सियोल और वॉशिंगटन के बीच परमाणु ‘लुका-छिपी’ का खेल चला, जिसमें दक्षिण कोरियाई परमाणु कार्यक्रमों के नाम बदलकर उन्हें नए सिरे से व्यवस्थित किया गया। माना जाता है कि 1979 में दक्षिण कोरियाई तानाशाह पार्क की हत्या के बाद ही परमाणु कार्यक्रम खत्म हुआ।
सोवियत संघ के विघटन और शीत युद्ध के बाद 1991 में दक्षिण कोरिया से आखिरी अमेरिकी परमाणु हथियार हटा लिए गए। फिर भी अमेरिका न्यूक्लियर अम्ब्रेला (परमाणु सुरक्षा कवच) के तहत दक्षिण कोरिया और जापान की सुरक्षा करता है। उत्तर कोरिया ने 9 अक्टूबर, 2006 को अपना पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण किया। इसने एक बार फिर दक्षिण कोरिया की चिंता बढ़ाई। दूसरी ओर 2004 से दक्षिण कोरिया में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या भी लगातार कम हो रही है।
डोनाल्ड ट्रंप का रवैया
डोनाल्ड ट्रंप के दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास कम करने के फैसले और उत्तर कोरिया के साथ समझौता करने की धमकियों से सियोल में असुरक्षा की भावना बढ़ी है। गौर करने वाली बात है कि इस समय उत्तर कोरिया के पास 60 परमाणु हथियार हैं। साथ ही रूस के साथ आपसी रक्षा संधि है।
चीन ने तेजी से दक्षिण चीन सागर में तेजी से विस्तार किया है। इसने दक्षिण कोरिया की बेचैनी साफतौर पर बढ़ाई है। इससे ये सवाल उठता है कि क्या ये असुरक्षा की भावनाएं दक्षिण कोरिया के परमाणु कार्यक्रम को उसी तरह फिर से शुरू करेंगी, जैसा 1970 के दशक में हुआ था।










