रियाद: सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के मक्का रक्षा समझौते ने कूटनीतिक और रणनीतिक हलकों में ध्यान खींचा है। इसे पश्चिम एशिया के नए सुरक्षा गठबंधन के तौर पर पेश किया जा रह है और इसकी तुलना नाटो से हो रही है। हालांकि भारत के लिए इस समझौते की वजह से जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने या अपनी विदेश नीति के मूल सिद्धांतों को बदलने का कोई खास कारण नहीं है। एक्सपर्ट का मानना है कि इस समझौते से अरब जगत या दुनिया में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आने जा रहा है। इसमें पाकिस्तान के होने की वजह से भारत को बहुत परेशान होने की जरूरत नहीं है।
पूर्व डिप्लोमैट आरके रैना ने एनडीटीवी में अपने विश्लेषण में कहा है कि नाटो से जुड़े किसी सिद्धांत को अपनाने से यह समझौता रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण नहीं हो जाता है। इन तीनों देशों की सीमाएं आपस में नहीं मिलतीं और उनकी रणनीतिक सोच अलग है। यहां तक कि समझौते के मकसद, लागू होने के दायरे या उन हालात के बारे में साफतौर पर कुछ नहीं कहा गया है, जिनमें ये तीनों देश असल में मिलकर काम करेंगे।
बड़ा रणनीतिक मकसद
फिलहाल सवाल यह है कि गठबंधन अभी क्यों बनाया गया है और इससे किसके बड़े रणनीतिक हितों को फायदा होगा। पाकिस्तान ने समझौता तात्कालिक सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि मुस्लिम दुनिया में अहमियत हासिल करने की लंबी अवधि की रणनीति के तहत किया है। पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान के लिए यह ऐसा नैरेटिव पेश करने का मौका देता है कि देश की सेना ने एक मजबूत क्षेत्रीय भूमिका हासिल कर ली है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते की तारीफ की है। इससे पता चलता है कि वॉशिंगटन, पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की को एक ऐसे ढांचे में लाने में फायदा देखता है, जो व्यापक अमेरिकी रणनीतिक हितों को पूरा करता हो। लंबी अवधि में ऐसा समझौता अमेरिका को एक और जरिया दे सकता है। इसके जरिए पाकिस्तान भविष्य की क्षेत्रीय जरूरतों में उपयोगी साबित हो सकता है।
इस समझौते को सिर्फ सऊदी-तुर्की-पाकिस्तान की पहल के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसके लंबे समय के असर को अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों के हितों और इस इलाके के साथ उनके भविष्य के जुड़ाव के नजरिए से देखा जाना चाहिए।
पाकिस्तान की महत्वाकांक्षा
पाकिस्तान को सऊदी अरब और तुर्की से आर्थिक मदद और कूटनीतिक जगह मिल सकती है। यह समझौता पाकिस्तान के लंबे समय के आर्थिक हितों के बजाय उसके सैन्य ढांचे के पक्ष में है। असीम मुनीर इसका इस्तेमाल एक मजबूत पाकिस्तानी सेना और मजबूत क्षेत्रीय रिश्ते की छवि बनाने के लिए कर सकते हैं।
UAE का सवाल गायब
कोई भी गल्फ सिक्योरिटी अरेंजमेंट, जिसमें यूएई शामिल ना हो, उसे एक बड़ा रीजनल अरेंजमेंट नहीं माना जा सकता है। यूएई गल्फ की अहम इकोनॉमिक, ट्रेडिंग और स्ट्रेटेजिक ताकतों में से एक है। इसने एक बिजनेस-फ्रेंडली इकोसिस्टम बनाया है, जो एंटरप्रेन्योर्स, इन्वेस्टर्स और ग्लोबल बिजनेस को अट्रैक्ट कर रहा है। यूएई को समझौते से बाहर रखने से यह सवाल उठता है कि मक्का अरेंजमेंट असल में कितना बड़ा गल्फ सिक्योरिटी आर्किटेक्चर बन सकता है।
भारत को इस समझौतो को यह मानने के जाल में नहीं पड़ना चाहिए कि मुस्लिम देश धर्म की वजह से पाकिस्तान के करीब आ जाएंगे। सऊदी अरब, UAE, कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान के साथ भारत के रिश्ते धर्म नहीं बल्कि सदियों पुराने कमर्शियल, सोशल और कल्चरल मेलजोल पर आधारित हैं। खाड़ी देशों में भारत की मौजूदगी तेल की तेजी से पहले से है। म
लाखों भारतीय खाड़ी देशों की इकॉनमी में सीधे योगदान देते हैं। भारत को हर साल करीब 60 बिलियन डॉलर का रेमिटेंस भारतीयों की ओर से एक बड़ा इकोनॉमिक लिंक और योगदान है। यह दोनों तरफ भारतीय ह्यूमन कैपिटल की अहमियत को दिखाता है। भारतीय टैलेंट खाड़ी देशों की इकॉनमी में गहराई से जुड़ गया है, जिसे कोई समझौता आसानी से नहीं तोड़ सकता है।










