E-20 से फीके हुए पकवान, चीनी में भारी उछाल, करना पड़ेगा आयात

भारत में ज़्यादातर मध्यमवर्गीय लोगों के लिए, ई-20 पर चल रही बहस कार से जुड़ी समस्या जैसी लग रही थी। सबके मन में सवाल यही था कि क्या उनकी पांच साल पुरानी कार 20 प्रतिशत इथेनॉल मिले पेट्रोल पर चल पाएगी, या उन्हें नई गाड़ी लेनी होगी? पिछले महीने तक यही चिंता थी।

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इस सबके बीच किसी का भी ध्यान चीनी की कीमतों पर नहीं गया था।

पिछले तीन हफ़्तों में, कई बाज़ारों में खुदरा चीनी की कीमत लगभग 45 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 70 रुपये तक हो गई है — यानी कीमतों में लगभग 55 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। त्योहारों का मौसम शुरू होते ही इस बढ़ोतरी का असर घरों की रसोई, मिठाई की दुकानों और छोटे व्यापारियों पर पड़ा है।

कोलकाता में, आस-पड़ोस की किराना दुकानों पर तीन दिन पहले तक खुली चीनी 65 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रही थी, लेकिन अब दुकानदारों का कहना है कि उन्हें 70 रुपये से कम कीमत पर स्टॉक नहीं मिल रहा है। शहर में थोक भाव पहले ही 65 रुपये तक पहुंच चुके हैं। व्यापारियों का कहना है कि त्योहारों के दौरान इस्तेमाल होने वाली चीज़ें जैसे गुड़, बताशा और नकुलदाना की कीमतें भी अब बढ़ सकती हैं।

इस बीच सरकार ने एक दशक पुराने ट्रेंड को उलट दिया है। इस साल मई तक, भारत — जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है — चीनी का एक्सपोर्ट (निर्यात) कर रहा था। लेकिन इस महीने सरकार ने कुछ ऐसा किया जो उसने लगभग दस सालों में नहीं किया था: उसने ड्यूटी-फ्री इंपोर्ट (आयात) की इजाज़त दे दी। इसके तहत 100 फीसदी कस्टम ड्यूटी हटा दी गई ताकि चीनी मिलें दस लाख टन कच्ची चीनी मंगा सकें और कीमतें काबू में की जा सकें।

हालांकि ऐसा करना इतना आसान नहीं होगा। जब भारत जैसा देश — जो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और हाल तक एक बड़ा निर्यातक रहा है — खरीदार के तौर पर विश्व बाजार में उतरता है, तो वहां भी कीमतें स्थिर नहीं रहतीं। वे बदलती हैं, और तेज़ी से बदलती हैं। चीनी के ग्लोबल बेंचमार्क पहले ही बढ़ने लगे हैं क्योंकि भारत की मांग, ब्राज़ील की कमज़ोर फ़सल के कारण बची सीमित सप्लाई के लिए होड़ कर रही है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि दस लाख टन चीनी भारत की अपनी मांग के सिर्फ़ दो हफ़्ते ही पूरे कर पाएगी, जिसका मतलब है कि सिर्फ़ आयात से कीमतों में हो रही बढ़ोतरी को रोकना मुमकिन नहीं होगा।

इसके अलावा मौसम से जुड़ी चुनौतियों को हटा भी दें, तो असल में यह कहानी ऐसी नीति की है जिसमें विरोधाभास और टकराव नजर आ रहा है।

पहला टकराव खुद गन्ने को लेकर है। भारत में गन्ना अब दो जगहों पर इस्तेमाल हो रहा है — चीनी मिल और इथेनॉल डिस्टिलरी — और सालों से सरकारी नीतियां चुपचाप ईंधन की तरफ झुकी हुई है। इथेनॉल के लिए हर सीज़न में लाखों टन गन्ने का इस्तेमाल किया जा रहा है; गन्ने के रस और बी-हैवी मोलासेज़ का इस्तेमाल इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम में हो रहा है, जिससे भारत ने तय समय से पहले ही 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल कर लिया। इसे ऊर्जा के क्षेत्र में एक बड़ी कामयाबी के तौर पर पेश किया जा रहा है, जबकि चीनी का बचा हुआ स्टॉक (क्लोजिंग स्टॉक) लगभग तीन दशकों में अपने सबसे निचले स्तर पर आने का अनुमान है।

दूसरी समस्या इस ट्रेड-ऑफ (आपसी समझौते) की सही कीमत तय न करना है। गन्ने से बनने वाले फीडस्टॉक के लिए इथेनॉल की खरीद दरें पिछले लगभग चार सालों में बहुत कम बदली हैं, जबकि चीनी की कीमतें और गन्ने की लागत लगातार बढ़ती रही है। इस वजह से मिलों के पास स्टॉक कम होने पर भी चीनी को ईंधन में बदलने का कोई खास आर्थिक प्रोत्साहन नहीं रहा — यानी कीमत का वह संकेत ही नहीं मिला जिससे यह दबाव कम हो सकता था।

तीसरा टकराव वह है जिसका किसी ने अनुमान नहीं लगाया था: बुवाई के मौसम में मॉनसून की बारिश सामान्य से काफी कम रही। इससे देश के दो सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों – महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश – में गन्ने की खेती का रकबा और पैदावार घट गई, जबकि इथेनॉल प्रोग्राम को उस समय पहले से कहीं ज़्यादा गन्ने की ज़रूरत थी।

इन सब बातों को एक साथ देखें तो ऐसा लगता है कि सरकार अपनी ही नीतियों से अवाक है। उसने तेज़ी से इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया, लेकिन चीनी के स्टॉक पर पड़ने वाले दबाव के बारे में शुरुआती चेतावनियों को नज़रअंदाज़ कर दिया। उसने मिलों को फ्यूल-ग्रेड डाइवर्जन पर ज़्यादा निर्भर रहने दिया, बिना इस फ़ैसले से जुड़े आर्थिक पहलुओं पर दोबारा विचार किए। और उसने फ्यूल पॉलिसी और फ़ूड पॉलिसी को दो अलग-अलग फ़ाइलों की तरह देखा, जिन्हें दो अलग-अलग मंत्रालय संभाल रहे थे, जब तक कि देश भर में कीमतों में आए उछाल ने उन्हें एक ही टेबल पर लाने के लिए मजबूर नहीं कर दिया।

सरकार ने अब थोक खरीदारों पर स्टॉक रखने की सीमा तय कर दी है और मिलों को जल्दी पेराई शुरू करने के लिए कहा है, साथ ही आयात का कदम भी उठाया है। राज्य स्तर के अधिकारियों ने कीमतों में बढ़ोतरी के लिए इथेनॉल के डाइवर्जन के बजाय जमाखोरी को जिम्मेदार ठहराया है — लेकिन ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले व्यापारी इस दावे से सहमत नहीं हैं।

लेकिन इस सच्चाई को अनदेखा नहीं किया जासकता है कि चीनी की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है। तीन हफ़्ते पहले चीनी की कीमत 45 रुपये प्रति किलो थी। आज यह 70 रुपये है। यह अंतर उस नीति की असली कीमत है, जिसने सालों तक फ्यूल सिक्योरिटी के लिए अपनी पीठ थपथपाई, लेकिन यह कभी नहीं सोचा कि इसका असर आम भारतीय की थाली में मौजूद चावल, चाय और मिठाइयों पर क्या पड़ेगा।

एथेनॉल उत्पादन से चीनी कीमतों में बढ़ोतरी को केंद्र ने किया खारिज, कहा- मक्के का हो रहा उपयोग

इस बीच केंद्र सरकार ने इस बात से इनकार किया है कि चीनी की कीमतों का एथेनॉल उत्पादन से लेना-देना है। सरकार ने शुक्रवार को कहा कि चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी का कारण एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी का इस्तेमाल करना बताना गलत है। आधिकारिक बयान में कहा गया कि एथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोग हो रही चीनी का शेयर 2025-26 में कम होकर करीब 9 प्रतिशत हो गया है, जो कि 2022-23 में करीब 12 प्रतिशत था। साथ ही, कहा कि मौजूदा समय में देश में एथेनॉल के उत्पादन के लिए मक्के का उपयोग हो रहा है।

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने बताया कि चीनी की कीमतों में मौजूदा बढ़ोतरी कई वजहों से हो रही है, जिनमें उम्मीद से कम घरेलू उत्पादन, त्योहारों के मौसम से पहले बढ़ी हुई मांग, मौसम की वजह से गन्ने की फसल को हुआ नुकसान, दुनिया भर में चीनी की सप्लाई में कमी और इंडस्ट्री के कुछ हिस्सों की तरफ से सट्टेबाजी और जमाखोरी शामिल हैं।

मौजूदा सीजन में चीनी का उत्पादन लगभग 306 लाख मीट्रिक टन (एलएमटी) रहने का अनुमान है, जबकि गन्ना उगाने वाले राज्यों का शुरुआती अनुमान लगभग 343 एलएमटी था। गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों के साथ-साथ ज्यादा बारिश की वजह से जलभराव से भी उत्पादन पर असर पड़ा है। अनुमान से कम उत्पादन के बावजूद, अक्टूबर में नया क्रशिंग सीजन शुरू होने तक घरेलू मांग को पूरा करने के लिए देश में चीनी का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

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