संयुक्त परिवार की वापसी, आर्थिक तंगी के चलते जेन-ज़ी भी लौट रहे हैं घर

संयुक्त परिवार भारतीय समाज को सदियों तक एकजुट रखने और मजबूती देने वाला बेहतरीन सामाजिक ढांचा रहा है। एक ही छत के नीचे तीन-चार पीढ़ियों का यह सह-अस्तित्व परिवारों को एक बड़ा सामाजिक समूह बनाता, आपसी रिश्तों में मिठास बनाए रखता और व्यक्तिगत संसाधनों को साझी अर्थव्यवस्था में तब्दील कर देता था।

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इसकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि यह बड़े परिवार के कमजोर सदस्यों-बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों, दिव्यांगों, बेरोजगारों और साधनहीनों- की पूरी देखभाल करते हुए सुनिश्चित करता था कि वे भी गरिमापूर्ण जीवन जी सकें। इसके महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता, क्योंकि उस जमाने में कोई सरकारी कल्याणकारी योजनाएं, पेंशन, वृद्धाश्रम या ‘आयुष्मान भारत’ जैसी कोई सामाजिक सुरक्षा छतरी नहीं थी।

मेरे पिताजी की पीढ़ी शायद इस ‘संयुक्त परिवार परंपरा’ की आखिरी पीढ़ी थी (उनका निधन 2017 में 93 वर्ष की आयु में हुआ था)। वह खुद एक बड़े और भरे-पूरे परिवार में पले-बढ़े थे, जिसमें माता-पिता, चार भाई-बहन, ढेर सारे चाचा-ताऊ, बुआ और उनके परिवार, तथा कुछ उपेक्षित-सी विधवा महिलाएं शामिल थीं। वे सब उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में स्थित उनके गांव में मेरे दादाजी द्वारा बनाई गई विशाल हवेली में एक साथ हंसी-खुशी रहते थे।

कतई मत सोचिएगा कि वह कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था थी। वह पूरी तरह पितृसत्तात्मक एकतंत्र था; दादाजी जो कह देते, वही अंतिम कानून होता और हर कोई उसे सहजता से स्वीकार करता क्योंकि इसीमें सबका साझा हित था।

मुझे लगता है कि भारतीय संयुक्त परिवारों का बिखराव 1960-70 के दशक में शुरू हुआ और 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत तक यह व्यवस्था लगभग दम तोड़ चुकी थी।

चीजें मेरी पीढ़ी यानी ‘बेबी बूमर्स’ (1946 से 1964 के बीच जन्मे) के साथ बदलनी शुरू हुईं। जैसे-जैसे शिक्षा, आने-जाने और रोजगार के अवसरों का विस्तार हुआ, युवाओं ने घर छोड़ना शुरू कर दिया- पहले बेहतर पढ़ाई और फिर नौकरियों के लिए। वे पैतृक घरों से दूर स्वतंत्र रूप से बसते चले गए। यह सिलसिला अगली पीढ़ी यानी ‘मिलेनियल्स’ के साथ और तेजी से बढ़ा। संयुक्त परिवार लगभग गायब हो गए और उनकी जगह एकल परिवारों ने ले ली।

यह सामाजिक बदलाव न केवल उपर्युक्त कारणों से अवश्यंभावी था, बल्कि लड़कियों की शिक्षा में सुधार का भी सीधा परिणाम था। वे अब कम उम्र में विवाह करके अपने जीवन की दिशा तय करने तक सीमित रहने को तैयार नहीं थीं। वे विवाह के बाद स्वतंत्र करियर और अपना अलग आशियाना चाहती थीं। पति-पत्नी कहां और कैसे रहेंगे, यह अब किसी कुलप्रमुख द्वारा नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था-नौकरी, वेतन, करियर की संभावनाओं और बिना मां-बाप के दखल के अपने परिवार को अपने तरीके से भविष्य तय करने की इच्छा से तय होने लगा था।

अब ‘जेन-ज़ी’ के साथ यह पहिया घूमकर वापस उसी मुकाम पर आ रहा है। विडंबना देखिए कि जिन ताकतों ने कभी उन्हें संयुक्त परिवार व्यवस्था से दूर धकेला था, वही आज उन्हें वापस इसकी ओर लौटने को मजबूर कर रही हैं! 20 से 30 साल के कामकाजी और बेरोजगार, विवाहित और अविवाहित युवा तेजी से अपने मां-बाप के साथ रहने के लिए लौट रहे हैं। यह बात आंकड़ों और जमीनी अनुभवों दोनों से साबित होती है। शोध बताते हैं कि 70-80 फीसद युवा अपने मां-बाप के साथ रहते हैं, और 20 फीसद युवा विवाहित जोड़े भी ऐसा ही कर रहे हैं; और यह रुझान लगातार बढ़ रहा है।

अपने खुद के सामाजिक और पारिवारिक दायरे में मैं देखता हूं कि हर दो में से कम-से-कम एक परिवार (जिसमें मेरा परिवार भी शामिल है) में यह सच साबित हो रहा है। यह बदलाव आर्थिक और महत्वाकांक्षा से जुड़ी व्यावहारिक मजबूरियों के चलते हुआ है। लड़के और लड़कियां, दोनों अधिक उम्र में शादी कर रहे हैं: लड़कियों की शादी की औसत उम्र बढ़कर 22.9 साल हो गई है (शहरी क्षेत्रों में 24- 27.5), और लड़कों के लिए यह 29 वर्ष (शहरों में 30 पार) हो चुकी है। अविवाहित रहने का सीधा मतलब है कि वे अपने माता-पिता के साथ ही रह रहे हैं।

इसके उलट, तलाक की दरें भी बढ़ रही हैं- 1990 के बाद यह 1.1 फीसद से बढ़कर 1.6 फीसद हो गई है। पश्चिमी मानकों से यह बेशक कम हो, लेकिन इसमें 50 फीसद वृद्धि हुई है। तलाक का मतलब है कि अलग हुए जोड़े वापस अपने माता-पिता के सुरक्षित आशियाने में लौट आते हैं।

इसका एक और बड़ा कारण बेरोजगारी है। देश के लगभग 40 फीसद स्नातक बेरोजगार हैं, और जो नौकरी कर भी रहे हैं उनका बड़ा हिस्सा वेतन में बमुश्किल गुजारा कर पा रहा है, खासकर महानगरों में। नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, 18 से 29 वर्ष के 8.70 करोड़ युवा न तो रोजगार, न शिक्षा में और न ही किसी प्रशिक्षण की श्रेणी में आते हैं। उनके पास मां-बाप के साथ रहने के अलावा विकल्प नहीं।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) भी अपना नकारात्मक असर दिखाने लगा है: बड़ी टेक कंपनियों ने पहले ही हजारों नौकरियां खत्म कर दी हैं और आने वाले समय में बहुतों की नौकरियों पर तलवार लटकने वाली है। टियर-2 और 3 के शहरों में भी घर खरीदना या किराये पर लेना इतना महंगा हो चुका है कि अकेले अलग रहना अधिकातर युवाओं के लिए हसीन ख्वाब जैसा हो गया है। ऐसे भारी खर्चों के बीच, बुजुर्ग माता-पिता और उनके भरे-पूरे घर अचानक आकर्षक लगने लगते हैं। इस तरह, संयुक्त परिवार व्यवस्था अचानक प्रासंगिक हो गई।  यह हम जैसे बूढ़े हो रहे ‘बेबी बूमर्स’ के लिए भी सहूलियत वाला है। यह दोनों पक्षों को रास आने वाली स्थिति है। लेकिन हर अच्छी चीज की तरह यहां भी एक पेंच है।

कुदरत का यह नियम कभी नहीं रहा कि संतान हमेशा जन्मदाताओं के साथ रहे। यही वजह है कि जंगली जानवर अपने शावकों को जीने का हुनर सिखाने के बाद दूर भगा देते हैं ताकि वे खुद अपना भरण-पोषण कर सकें। संयुक्त परिवार जीवन के इस बुनियादी नियम से थोड़ा अलग रास्ता चुनते हैं।

जब कई वयस्क एक साथ रहते हैं, तो तनाव होना स्वाभाविक है। यह तनाव भिन्नताओं से पैदा होता है। मेरे पिताजी के दौर के संयुक्त परिवार इन तनावों को एक सर्वमान्य सत्ता- यानी परिवार के मुखिया- के जरिए सुलझा लेते थे।

लेकिन यह बात जेन-ज़ी, अल्फा और भविष्य के गर्भ में पल रही किसी भी अन्य अंग्रेजी वर्णमाला वाली पीढ़ी पर लागू नहीं होती। आज युवाओं को सवाल पूछना सिखाया जाता है, न कि हर बात को आंख मूंदकर स्वीकार करना। वे अपनी बात खुलकर कहना जानते हैं, किसी सत्ता के आगे चुपचाप झुकना नहीं। यह बात पारंपरिक संयुक्त परिवारों के मिजाज के बिल्कुल विपरीत है, और मैं इसे कई घरों में प्रत्यक्ष घटते देख रहा हूं।

संयुक्त परिवार व्यवस्था के इस ‘दूसरे चरण’ को सफल बनाने के लिए बहुत धैर्य, आपसी समझ, समझौते की भावना, सच्ची देखभाल और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की दरकार होगी। यह अभी प्रयोग के दौर में है। लेकिन मैं चाहता हूं कि यह सफल हो, क्योंकि परिवार ही किसी भी समाज की रीढ़ होते हैं और खुशहाल एवं संगठित परिवार ही स्थिर सामाजिक व्यवस्था का निर्माण करते हैं-जिसकी आज की इस बिखरी दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है।

(अभय शुक्ला सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं। यह https://avayshukla.blogspot.com से लिए उनके लेख का संपादित रूप है।)

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