रंगभरी एकादशी: 151 किलो गुलाब के अबीर से खेलेंगे होली, पालकी यात्रा में गूंजेंगे 108 डमरू

वाराणसी। रंगभरी एकादशी के चौथे दिन बुधवार को बाबा विश्वनाथ माता गौरा को मायके से विदा कराकर कैलाश लौटने की परंपरा हैं। मंगलवार शाम को तीसरे दिन काशी पुराधिपति गौना कराने अपने ससुराल पहुंचे। जहां खास ‘रंगभरी ठंडई’ से बाबा और बारात का स्वागत किया गया। बाबा को राजसी वेशभूषा और मां गौरी हाथों से कढ़ाई की हुई परिधान पहनेंगी।

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गौरा का गौना कराने परंपरा बाबा विश्वनाथ दरबार से 357 वर्षों से जुड़ी है

महंत कुलपति तिवारी ने बताया कि बाबा और मां गौरा की रजत प्रतिमा रंगभरी एकादशी के दिन 357 वर्षों से निकलती आ रही हैं। मेरे पूर्वजों द्वारा परंपरा की शुरुआत की गयी थी। बाबा विश्वनाथ व माता पार्वती की गोदी में प्रथम पूज्य गणेश की रजत प्रतिमाओं को एक साथ सिंहासन पर विराजमान कराया गया। पूजन-आरती कर भोग लगाया गया। महिलाओं और नगर के कलाकारों ने मंगल कामनाओं से परिपूर्ण पारंपरिक गीत लोक नृत्य से ससुराल पहुंचे काशी पुराधिपति का स्वागत हुआ।

महंत आवास पर चार दिनों से रंगभरी एकादशी का उत्सव चल रहा हैं।
महंत आवास पर चार दिनों से रंगभरी एकादशी का उत्सव चल रहा हैं।

आज होने वाले दिन भर के कार्यक्रम

रंगभरी एकादशी पर 24 मार्च को बाबा के पूजन का क्रम ब्रह्म मुहूर्त में मंहत आवास पर आरंभ होगा। बाबा के साथ माता गौरा की चल प्रतिमा का पंचगव्य तथा पंचामृत स्नान के बाद दुग्धाभिषेक किया जाएगा। दस बजे चल प्रतिमाओं का राजसी शृंगार एवं पूर्वाह्न साढ़े ग्यारह बजे भोग आरती के बाद के बाबा का दर्शन आम श्रद्धालुओं के खोला जाएगा। सायं पौने पांच बजे बाबा की पालकी की शोभायात्रा टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास से विश्वनाथ मंदिर तक निकाली जाएगी।

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